Friday, January 25, 2019

खता की सज़ा?


उस दिन रात के लगभग दस बज चुके थे। मैं सोने की तैयारी कर रहा था। तभी मोबाइल स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमका। मैंने फोन उठा लिया। उधर से आवाज आई, ‘‘अंकल मैं कोरबा से आपके पुराने मित्र अनिल सहगल का बेटा बोल रहा हूं। पापा नहीं रहे। परसों शुक्रवार को पगड़ी रस्म है।’’ मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही फोन बंद हो गया। मैं जानना चाहता था कि सहगल अचानक कैसे चल बसा। सहगल मेरा कॉलेज के जमाने का दोस्त था। हालांकि कॉलेज छोड़ने के बाद हमारा कभी मिलना नहीं हो पाया। उसके पिता लोहे के बहुत बड़े कारोबारी थे, लेकिन सहगल साहित्य प्रेमी था। अक्सर कहा करता था कि वह कभी भी व्यापार के क्षेत्र में नहीं जाएगा। बी-कॉम की पढ़ाई के दौरान ही उसकी लिखी कविताएं और गज़लें यहां-वहां की पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। वह प्रकाशित कविताओं की कटिंग को ऐसे संभाल कर रखता था जैसे वे कोई अनमोल खजाना हों। बी.कॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद हम अपने-अपने शहर चले गये। मैं बिलासपुर में एक दैनिक समाचार में नौकरी करने लगा। उसने कोरबा में बर्तन की दुकान खोल ली थी। वैसे यह सच्चाई हैरान करने वाली थी। कुछ वर्षों के पश्चात मैं रायपुर जाकर रहने लगा। वहां पर भी लगभग बारह वर्ष तक विभिन्न अखबारों की नौकरी बजायी। उसके पष्चात अपने अखबार के प्रकाषन के इरादे के साथ नागपुर जा पहुंचा। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये। बच्चों के भी बच्चे हो गये। अपने काम के अलावा किसी को याद करने का समय ही नहीं मिला।
सातेक वर्ष पूर्व किसी पत्रिका के पन्ने पलटते-पलटते उसमें छपी कविता, कवि के नाम और उसकी तस्वीर पर नज़र थमी की थमी रह गई। जिस अनिल सहगल को मैं भूल चुका था वह एकाएक जैसे मेरे सामने आ खड़ा हुआ। कविता के साथ छपी फोटो बता रही थी कि उसे कवि की जवानी के दिनों में खींचा गया है। उसके बाद तो मैं विभिन्न पत्रिकाओं और दैनिकों के रविवार अंक में छपने वाली कविताओं और गज़लों पर नजरें गड़ाये रहता। कभी-कभार उसकी लिखी कविता और गज़ल का दीदार हो जाता। इसी दौरान एक पत्रिका में उसका मोबाइल नंबर कविता के साथ नजर आया तो मेरी उससे बातचीत भी होने लगी। उसी ने बताया कि बर्तन की दुकान कब की बंद हो चुकी है। दोनों बेटे विदेष में नौकरी कर रहे हैं। माता-पिता भी स्वर्ग सिधार गये हैं। पिता की जमीन-जायदाद और खेती बाड़ी पर उसके तीनों भाइयों ने कब्जा जमा लिया है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में समय-समय पर होने वाले कवि सम्मेलनों में उसे सम्मान के साथ बुलाया जाता है और अन्य कवियों की तुलना में उसे मोटे लिफाफे मिल जाते हैं। शहर की मुख्य सड़क पर खुद का घर है, जिसकी कीमत आज करोड़ों में है। घर के ऊपर के चार कमरे किराये पर दे रखे हैं, जिससे हर माह दस हजार रुपये मिल जाते हैं। हम दोनों की बड़े मज़े से कट रही है। मोबाइल पर होने वाली बातचीत में अक्सर मुझे यही आास होता कि वह नषे में है। बात करते-करते वह बड़बड़ाने लगता था। कई बार तो आधी रात को उसका फोन आ जाता और अपनी नई कविता या गज़ल सुनाने लगता। कभी-कभी तो बच्चों की तरह जोर-जोर से रोता भी। सच कहूं तो मेरे लिए वह बहुत ही रहस्यमयी हो गया था।
बहुत सोचने-विचारने के बाद मैंने निष्चय कर लिया कि सहगल की पगड़ी रस्म में अवष्य जाऊंगा। रात की ट्रेन पकड़कर मैं सुबह छह बजे कोरबा पहुंच गया। पगड़ी की रस्म कहां होनी थी इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी। स्टेशन के पास स्थित होटल में दो-ढाई घण्टे तक आराम करने के बाद मैंने अपने एक परिचित पत्रकार मित्र से मिलने की ठानी। उसका मोबाइल नंबर मेरे पास नहीं था। नाष्ता करने के बाद मैं उसके कार्यालय जा पहुंचा। बहुत देर तक हम इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर मैं मुद्दे की बात पर उतर आया। उसे तो सहगल के गुजर जाने की जानकारी भी नहीं थी। मेरे काफी अनुरोध करने पर वह सहगल के घर चलने को तैयार हुआ। घर पहुंचे तो वहां ताला लगा था।
पड़ोसी ने बताया कि करीब स्थित धर्मशाला में दोपहर एक बजे पगड़ी रस्म की जाएगी। सहगल के पड़ोसी पत्रकार मित्र से वाकिफ थे इसलिए उन्होंने चाय पीने के लिए हमें रोक लिया। मित्र ने उन्हें मेरा परिचय देते हुए बताया कि ये सहगल की पगडी रस्म में शामिल होने के लिए नागपुर से यहां आए हैं। पड़ोसी वहीं के हाईस्कूल में शिक्षक थे। उनकी बातचीत के अंदाज से मुझे यह समझने में देरी नहीं लगी कि उन्हें सहगल के इस दुनिया को अलविदा कह जाने का कोई गम नहीं था। हमारे यहां जो गुजर जाते हैं उनकी बुराई करने से बचा जाता है, लेकिन शिक्षक तो जैसे सहगल के जीवन के सभी काले पन्ने खोलने की राह देख रहे थे। वह हद दर्जे का पियक्कड़ था। तब तक पीता रहता जब तक लुढ़क नहीं जाता। उसकी इसी आदत की वजह से पत्नी तीन साल पहले अपने बड़े बेटे के पास कनाडा चली गई। पत्नी के जाने के बाद उसने वेश्याओं को अपने घर लाना शुरू कर दिया था। कोई समझाता तो उसी पर बरस पड़ता। कोई उसके घर की तरफ झांकता तो गंदी-गंदी गालियां देने लगता। चौबीस घण्टे घर के खिड़की-दरवाजे बंद रखता। नषे में चीख-चीख कर यही कहता रहता कि इस शहर के सभी लोग मेरी जान के दुश्मन हैं। मेरी हत्या करने की साजिषें रची जा रही हैं। शराब और शबाब के चक्कर में वह कहीं का न रहा। अच्छा-खासा घर था वो भी बिक गया। पिछले सात-आठ महीनों से वह धर्मशाला के एक छोटे से कमरे में रह रहा था। पहले अंग्रेजी पीता था, अब देसी चढ़ाने लगा था। धर्मशाला वाले भी उसे वहां से खदेड़ने की तैयारी में थे। उसके मरने की वास्तविक तारीख किसी को पता नहीं है। कमरे से वह चार-पांच दिन से बाहर नहीं निकला था। वैसे ऐसा अक्सर होता था। धर्मशाला में ठहरे कुछ मुसाफिरों ने प्रबंधकों को कमरे से दुर्गंध आने के बारे में बताया तो कमरे का दरवाजा तोड़ा गया। सहगल बिस्तर पर मरा पड़ा था। चारपाई के नीचे खाली देसी षराब की बोतलें बिखरी पड़ी थीं। षिक्षक महोदय और भी बहुत कुछ बताना चाहते थे, लेकिन हम वहां से निकल लिए।
दोपहर के सवा एक बजे तक हम दोनों धर्मशाला के उस हॉल में पहुंच गए जहां पर सहगल की पगड़ी रस्म आयोजित थी। मुझे यह देखकर बेहद धक्का लगा कि वहां पर पंडित जी, सहगल के बेटे के अलावा दो और लोग ही बैठे थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छह लोग! हम दोनों ने सहगल की तस्वीर पर फूल चढ़ाये और वहां बैठ गए। पंडित जी दो बजे तक इस इंतजार में बैठे रहे कि कुछ और लोग आ जाएं तो पगड़ी की रस्में पूरी की जाएं, लेकिन उपस्थितों का आंकड़ा नहीं बढ़ पाया। आखिरकार सहगल के बेटे के अनुरोध पर पंडित जी ने बड़े बुझे मन से पूजा-पाठ कर कुछ मंत्र पढ़े और दक्षिणा का लिफाफा लेकर चलते बने। विदा लेते समय सहगल के बेटे के चेहरे पर जो पीड़ा और षर्मिंदगी देखी वह कई दिनों तक व्यथित करती रही। उसकी आंखों में ठहरे आंसू मुझे भिगोते रहे। अब भी जब कभी उस मनुष्य की याद आती है तो सहगल पर बहुत गुस्सा आता है। वह तो चला गया, लेकिन बेटे को उम्र भर की सज़ा दे गया! पांच साल से ज्यादा का समय बीत गया है सहगल को इस दुनिया से विदा हुए। आज एकाएक सहगल की याद आने की वजह है शहर के सभी दैनिक अखबारों में प्रकाषित यह खबर जो हर संवेदनषील पाठक को स्तब्ध और मुझे उसकी याद दिला उदास कर गयी: ‘‘महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में मंगलवार की दोपहर में उम्रदराज भाई-बहन के शव घर में मिले। उनका पालतू श्वान भी मरा हुआ पाया गया। तीनों की चार से पांच दिन पहले मृत्यु होने का संदेह है। षवों का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का कहना है दोनों भाई-बहन के पेट में एक दाना तक नहीं था। यानी उनकी मौत भूख की वजह से हुई थी। जबकि घर में आठ ड्रमों में अनाज भरा पड़ा था। यह भी काबिलेगौर है कि भाई के खाते में 36 लाख और बहन के खाते में एक लाख तीस हजार जमा थे। बिना प्लास्टर के जर्जर से दिखने वाले घर की कीमत भी दस करोड़ से ज्यादा है। दोनों भाई-बहन बहुत ही कम घर से बाहर निकलते थे। किसी को घर के भीतर आने नहीं देते थे। पता नहीं किस वजह से दोनों भयभीत रहते थे। सड़क और  भीड़-भाड़ वाले रास्तों पर चलने से बेहद घबराते थे। अपने पड़ोसियो से कभी भी उन्हें बात करते नहीं देखा गया। मिलना-जुलना तो बहुत दूर की बात है। इंसानों से दूरी बनाकर रखने वाले ये भाई-बहन जानवरों के बहुत करीब थे। एक समय ऐसा भी था जब बस्ती में घूमने वाले ष्वानों के लिए प्रतिदिन पचास लीटर दूध खरीदकर उन्हें पिलाया करते थे। उन्होंने घर में भी बीस श्वान पाल रखे थे। कुछ समय बाद उनके पास दो ष्वान ही बचे रह गए, जिसमें से उनकी मौत के साथ एक की मौत हो गई, दूसरा अंधा और बेहरा था जो बेहोशी की हालत में मिला। उनके घर के कमरों को देखकर लगता है कि जैसे वहां पर भूत रहते रहे हों! उनकी मौत के बाद भी कोई रिश्तेदार सामने नहीं आया। तालाबंद घर में हुई भाई-बहन की रहस्यमयी मौत चर्चा का विषय बनकर रह गई है।’’

Thursday, September 8, 2011

ऊंट आया पहाड के नीचे?

कारण चाहे जो भी हों पर राहत देने वाली बात तो जरूर है कि देश में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ माहौल बन चुका है। दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार के कानों पर भी जूं रेंगने लगी है और एक-एक कर देश के लुटेरों को सलाखों के पीछे पहुंचाया जाने लगा है। राजनीति के कुख्यात दलाल अमर सिं‍ह की तिहाड जेल रवानगी से यह संदेश भी देने की कोशिश की गयी है कि देर है पर अंधेर नहीं...। हालांकि इसके पीछे भी बहुत बडी राजनीति देखी जा रही है। पिछले कई वर्षों से कर्नाटक में अपनी दादागिरी की बदौलत सामानांतर सरकार चलाते चले आ रहे खनन माफिया रेड्डी बंधुओं पर भी आखिरकार सीबीआई के शिकंजे ने असर दिखाया है और उन्हें भी जेल में डाल दिया गया है। रेड्डी बंधुओं और अमर सिं‍ह में ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों ही राजनीति के माथे का ऐसा कलंक हैं जिनकी जडें बहुत गहरे तक समायी हैं। ऐसे ही दुष्टों और बेइमानों के कारण ही कई लोग राजनीति को वेश्या का दर्जा देने में नही हिचकिचाते। नेताओं का नकाब ओडकर खुले आम डकैती करने वाले रेड्डी बंधुओं को प्रारंभ से ही भारतीय जनता पार्टी का साथ मिलता चला आ रहा है। अब जब वे जेल भेजे जा चुके हैं तो पार्टी के दिग्गजों की सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो चुकी है। उन्हें यह भय भी सता रहा है कि कहीं रेड्डी बंधुओं के समर्थक विधायक बगावत पर उतरने के बाद मौजूदा कर्नाटक सरकार की ही धराशायी न कर दें। वैसे यह खतरा तो है ही। जो भ्रष्टाचारी सरकार बनाने में मददगार हो सकते हैं वे अपना बुरा वक्त आने पर भट्ठा भी बिठा सकते हैं। रेड्डी बंधु और अमर सिं‍ह जैसे अवैध करोबारी राजनीतिक गलियारों में विचरण करने वाले ऐसे सांप हैं जो दूध पिलाने वाले को भी काटे बिना नहीं रहते। यही इनकी असली फितरत है जिसे राजनीति के बडे-बडे खिलाडी जानते समझते तो हैं पर उनका इनके बिना काम भी नहीं चलता। आडे वक्त के लिए इन खोटे सिक्कों को संभाल कर रखना उनकी मजबूरी है। कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में बडे-बडे राजनेताओं की शह पर अवैध उत्खनन कर हजारों करोड रुपये के वारे-न्यारे कर चुके रेड्डी बंधुओं के यहां मारे गये छापे में केवल ३० किलो सोना और चार-पांच करोड नगद बरामद हुए। देखा जाए तो यह कुछ भी नहीं है। जो धनपशु एक मंदिर में आठ सौ हीरों का जडा मुकुट और स्वर्ण जडि‍त करोडों की साडी अर्पित कर सकते हैं उनके लिए यह रकम कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए मंदिरों में करोडों का चढावा चढाने और नौकरशाही को मुंहमांगी थैलियां देने में ज्यादा फर्क नहीं है। उनके यहां से अरबों-खरबों की दौलत बरामद होनी चाहिए थी। इससे ज्यादा माल तो आजकल शहरों के सरकारी ठेकेदारों के यहां मारे गये छापों में ही बरामद हो जाता है। सरकारों को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले रेड्डी बंधुओं के पास कितनी काली दौलत होगी इसका अता-पता तो उन्हें भी नहीं होगा। ऐसे में सीबीआई तो क्या दुनिया की कोई भी जांच एजेंसी इन खनिज माफियाओं की लुकी-छिपी अथाह दौलत के असली ठिकानों का पता नहीं लगा सकती।डकैती और हेराफेरी में चंदन तस्कर विरप्पन को मात देने वाले रेड्डी बंधुओं को अगर राजनीति का मुखौटा पहनने का अवसर न मिला होता तो ये लोग बहुत पहले ही सरकारी मेहमान बना कर जेल भिजवा दिये गये होते। देश के तमाम शातिर लुटेरे इस हकीकत से बहुत जल्दी वाकिफ हो जाते हैं कि यदि उन्हें बेखौफ होकर अपने काले धंधों को अंजाम देते रहना है तो राजनीति और सत्ताधारियों का दामन थामना ही होगा। कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगडे यदि इन डकैतों का पर्दाफाश नहीं करते तो यह अभी तक खुली हवा में सांस ले रहे होते। बिलीकोरे बंदरगाह से ३५ लाख टन लौह अयस्क रातों-रात गायब करने का कीर्तिमान रच चुके रेड्डी बंधुओ के समक्ष दुनिया की सबसे बडी प्रख्यात स्टील निर्माता कंपनी आर्सेलर मित्तल लिमिटेड भी कोई मायने नहीं रखती। लक्ष्मी मित्तल देश और दुनिया के जाने-माने उद्योगपति हैं और उन्होंने यह मुकाम खून-पसीना बहाकर हासिल किया है। रेड्डी बंधुओं ने तो देश की बहुमूल्य खनिज सम्पत्ति की हेराफेरी कर हजारों करोड का साम्राज्य खडा किया है। हराम की कमायी करने वाले किस तरह से अंधाधुंध दौलत लुटाते हैं उसे जानने के लिए यह जान लेना भी जरूरी है कि रेड्डी बंधु सोने की जिस कुर्सी पर विराजमान होते हैं उसकी कीमत है ढाई करोड। जिस सोने की प्रतिमा के समक्ष सिर झुकाते हैं वह तीन करोड की है। घर में खाने-पीने के जो बर्तन हैं वो भी सोने के हैं। सैर-सपाटे के लिए इन रईसों के पास चार हेलिकॉप्टर हैं। राजसी ठाठ-बाट वाला यह जलवा देश के लुटेरों की असली नीयत को बयां कर देता है। सत्ता के दलाल अमर ‍सिं‍ह की भी कुछ ऐसी ही दास्तां है। वे किसी जमीन में फकीर थे। राजनेताओं से नजदीकियां बढाने के बाद देखते ही देखते मालामाल हो गये। उनके जेल जाने पर किसी को भी हैरानी नहीं हुई।सत्ता के इस दलाल की भी वर्षों पहले जेल रवानगी हो गयी होती पर कुछ राजनेताओं ने इसे सतत बचाए रखा। सत्ताधारियों को ब्लैकमेल करने में माहिर अमर सिं‍ह ने उद्योगपतियों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों से दोस्ती-यारी कर जो अरबों-खरबों रुपये कमाये उसका काला-चिट्ठा मीडिया के द्वारा कई बार उजागर किया गया पर उनका बाल भी बांका नहीं हो पाया। 'कैश फॉर वोट' कांड के नायक रहे अमर सिं‍ह ने राजनीति के मैदान में सर्कसबाजी कर न जाने कितनी दौलत कमायी। अपनी इस अथाह काली माया को सफेद करने के लिए पचासों फर्जी कंपनियां भी खडी कीं। कार्पोरेट घरानों को प्रलोभन देकर राजनेताओं और उनकी पार्टियों के लिए चुनावी फंड जुटाने वाला ऊंट अब पहाड के नीचे आ चुका है। देखें क्या होता है...। वैसे अमर सिं‍ह आसानी से हार मानने वालों में नहीं हैं। कई राजनीतिक दिग्गजों के रहस्य उनकी मुट्ठी में कैद हैं। क्या पता क्या धमाका कर गुजरें। धमाका तो रेड्डी बंधु भी कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने भी जो खनन डकैतियां की हैं उनमें वे अकेले नहीं थे। न जाने कितने और सफेदपोश भी उनके साथ शामिल थे। तभी तो उन तमाम सफेदपोशों के चेहरों के रंग भी उड चुके हैं।

Thursday, July 1, 2010

यही सच है...

जमाना कितना भी बदल गया हो पर एक सच्चाई अपनी जगह पर डटी हुई है। शरीफ लोग पुलिस वालों की छाया से भी दूर रहना चाहते हैं। यदि बदकिस्मती से किसी शरीफ का खाकी वर्दी वाले से पाला पड जाए तो वह अपनी जेब हल्की कर उसके चंगुल से बचकर खिसक जाने में ही अपनी भलाई समझता है। इसलिए तो यह भी कहा जाता है कि खाकी से भगवान बचाये रखे। दरअसल हिन्दुस्तान की पुलिस की छवि ही कुछ ऐसी है कि आम जन उससे खौफ खाते हैं। बिगडे नवाबों, गुंडे बदमाशों, नेताओं, बलात्कारियों लूटेरों, हत्यारों को सहलाने वाली पुलिस में कर्तव्यनिष्ठ चेहरों का नितांत अभाव है। जिन लोगों का कभी भूले से पुलिस वालों से वास्ता पडता है वे इसकी असलियत बताने से भी नहीं चूकते। पर ऐसा कम ही देखने में आया है कि किसी पुलिस वाले ने ही पुलिस के काले सच का चेहरा उजागर करने का साहस दिखाया हो। न जाने कितने खाकी वर्दी वाले ऐसे भी होंगे जिनका पुलिस महकमें में रहकर दम घुटता होगा। तय है कि उन्हें अंधरेगर्दी, अराजकता, गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार का वो वातावरण रास नहीं आता होगा जो वर्षों से भारतीय पुलिस का अंग बन चुका है। अपना घर-परिवार चलाने की मजबूरी के चलते पुलिस विभाग के खूंटे से जबरन बंधे रहने वालों की भीड में से बाहर निकलने का साहस दिखाना यकीनन कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। यहां हम योगेश प्रताप िसंह का जिक्र कर रहे हैं जिन्होंने लगभग छह वर्ष पूर्व भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी को लात मार कर किनारा कर लिया था। सन १९८५ बैच के इस आईपीएस अधिकारी को पुलिस विभाग में व्याप्त भर्राशाही, अंधेरगर्दी, भ्रष्टाचार और राजनेताओं की दखलअंदाजी ने इस कदर बेचैन और आहत कर डाला कि उनका दम घुटने लगा था। उन्होंने देश की सेवा के लिए संविधान की रक्षा की शपथ ली थी। पर यहां तो शपथ का ही उपहास उ‹डाया जा रहा था। कानून के रखवाले कानून की धज्जियां उडा रहे थे। योगेश प्रताप ि‍संह जिन सपनों को पूरा करने के लिए पुलिस में भर्ती हुए थे उन्हें टूटने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। वे किसी भी हालत में स्वयं को उन वर्दीवालों में शामिल नहीं कर पाये जिन्होंने हालातों से समझौता कर अपनी खुद्दारी का गला तक घोटकर रख दिया था। उसी दौर में उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसमें महाराष्ट्र के नेताओं, मंत्रियों, पुलिस अधिकारियों और माफियाओं के शर्मनाक गठजोड का ऐसा स्पष्ट खुलासा किया कि सत्ता और नौकरशाहों के गलियारों में खलबली मच गयी। कई कफनचोर पुलिसिये बौखला उठे। ऐसा होना जायज भी था क्योंकि सच बेहद कडवा होता है। उसकी कडवाहट और चुभन तब और भी विषैली हो जाती है जब अपने ही बीच का कोई साथी खडा हो जाता है और सच कहने का अभूतपूर्व साहस कर गुजरता है।हां यह योगेश प्रताप सि‍ंह का साहस ही था कि उन्होंने बेखौफ होकर लोगों को बताया कि ऊपर से कडक और दबंग दिखने वाले अधिकांश पुलिस अधिकारी सफेदपोश नेताओं के हाथों के खिलौने भर हैं। मंत्री इन्हें जैसा नचाते हैं यह वैसा ही नाचते हैं। कानून-वानून से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस की नौकरी पाने से लेकर मनचाहा थाना हथियाने तक के लिए बोलियां लगती हैं। जो जितनी मोटी थैली मंत्रीजी के चरणों में चढाता है वो उतना ही बडा पद आसानी से पा जाता है। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की पुलिस विभाग में कोई कद्र नहीं है। बडे अफसरों और राजनेताओं के इशारों पर नाचने वाले पुलिस वालों को तरक्की पर तरक्की मिलती चली जाती है। योगेश प्रताप सि‍ंह ने खाकी वर्दी पहनने के साथ ही कसम खायी थी कि चाहे कुछ भी हो जाए वे रिश्वत नहीं लेंगे। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। उनकी यही जिद उनकी तरक्की में बाधा बनती रही। वे जब धन लेते ही नहीं थे तो देते कहां से? ऐसे में उन्हें नालायक मान लिया गया और उनकी अवहेलना की जाने लगी। मंत्रीजी की कृपा से उनके साथ के आईपीएस अधिकारी आईजी बना दिये गये और उन्हें प्रमोशन से कोसों दूर रखा गया। इसी पुलिस विभाग में जैसे-तैसे लगभग बीस वर्ष तक काम करते-करते उन्हें कुछ इस तरह के झटके भी झेलने पडे कि जिस अफसर के खिलाफ उन्होंने जांच की और दोषी पाया उसी को ऊपर वालों की मेहरबानी से उनका बॉस बना दिया गया। जिन अराजक तत्वों, अपराधियों और माफियाओं को उन्होंने सरे बाजार पीटा और हथकडि‍यां पहनायीं वही कालांतर में नेता का चोला पहनकर विधायक, सांसद और मंत्री बने। ऐसे काले-कलूटे अतीतधारियों को सलाम ठोकना और जी हजूरी करना इस जि‍ंदादिल शख्स के उसूल के खिलाफ था। ऐसे में एक स्वाभिमानी इंसान को जो रास्ता चुनना चाहिए वही योगेश प्रताप सि‍ंह ने भी चुना। उन्होंने जब इस्तीफा दिया था तब मैंने यह लिखा था कि 'योगेश प्रताप सि‍ंह का पुलिस की नौकरी को लात मारना एक तरह से पलायन भी है। यह पलायन उन धनपशुओं का मनोबल बढायेगा जिन्होंने पुलिस महकमे को रंडी के कोठे से भी बदतर बनाने का गुनाह किया है। सि‍ंह जैसे लोग ही इस सडी-गली व्यवस्था को बदल सकते हैं। महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री और गृहमंत्री यदि प्रदेश के पुलिस विभाग में ऊपर से नीचे तक बदलाव लाना चाहते हैं तो उन्हें इस अफसर के दर्द को समझने, में जरा भी देरी नहीं करनी चाहिए।' पर यहां पर सुधार लाने और किसी की पीडा को जानने की किसे पडी है। शासकों से तो ऐसी उम्मीद करना ही बेकार है। नौकरी छोडने के बाद योगेश प्रताप ने निष्क्रियता का चोला नहीं ओडा। आम आदमी की लडाई लडाने के लिए वे वकालत के मैदान में कूद पडे। उन्होंने मुम्बई हाई कोर्ट में प्रेक्टिस करते हुए आम नागरिकों के हित के लिए लगातार याचिकाएं दाखिल करते हुए वो नाम और सम्मान कमाया है जो पुलिस में रहकर तो कतई संभव नहीं था। उनकी याचिकाओं पर हुए फैसलों के चलते कई बार महाराष्ट्र सरकार को अपने फैसले बदलने पर विवश होना पडा है। हां उनसे मुम्बई के बिल्डर, भूमाफिया और अराजकतत्व खासे खफा रहते हैं। पर उन्हें कल की तरह आज भी किसी की परवाह नहीं है। वे इन दिनों एक फिल्म भी बना रहे हैं। जिसमें वही दिखाने जा रहे हैं जो उन्होंने पुलिस की नौकरी के दौरान देखा, भोगा और जाना। फिल्म में एक दृश्य में एक नये आईपीएस अफसर को एक हवलदार की ईमानदारी से प्रभावित होकर कभी भी रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार न करने की प्रतिज्ञा लेते हुए दिखाया गया है। वहीं दूसरी और एक भ्रष्ट और चाटूकार कमिश्नर को अपना कार्यकाल बढवाने के लिए गृहमंत्री के चरणों में गिडगिडाते हुए दिखाने के साथ-साथ एक मंत्री के माफियाओं के साथ करीबी रिश्तों का भी फिल्म में खुलकर खुलासा किया गया है। यह मंत्री महोदय वर्तमान में भी महाराष्ट्र सरकार में शामिल हैं। तय है कि इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए बडी ताकतें जोर लगायेंगी। पर योगेश प्रताप सि‍ंह ऐसी-वैसी मिट्टी के नहीं बने हैं कि हार मान लें और चुपचाप बैठ जाएं...। हां योगेश प्रताप सि‍ंह जो फिल्म बना रहे हैं उसका नाम है 'यही सच है...।'

Thursday, June 24, 2010

भाजपा तो है थैलीशाहों की पार्टी

जब से संघ की पसंद नितिन गडकरी ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कुर्सी पायी है तभी से पार्टी की इमारत धसकती-सी दिखायी देने लगी है। इस डगमगाती इमारत पर कई नेता अपना-अपना डंडा लेकर खडे हैं। डंडे में झंडा कहीं नजर नहीं आ रहा है। नितिन गडकरी भले ही यह कहते नहीं थक रहे हों कि भारतीय जनता पार्टी काम करने वालों की कदर करना जानती है और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वे स्वयं हैं जो कभी दिवारों पर पोस्टर चिपकाया करते थे और आज पार्टी के अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं। अध्यक्ष महोदय सच कहते हैं या झूठ यह भी खोज और शोध का विषय है।जिन्होंने भाजपा को बहुत करीब से देखा और जाना है उनका निष्कर्ष तो यही बताता है कि यह पार्टी रईसों की पार्टी है। इसमें सौदागरों की भरमार है। खाली जेब वालों की यहां कोई पूछ-परख नहीं होती। वैसे तो देश की लगभग हर राजनीतिक पार्टी का यह उसूल बन चुका है कि विधान परिषद और राज्यसभा में धन्नासेठों को ही पहुंचाओ और फटेहालों को दिलासा देकर मुंह ताकते रहने के लिए छोड दो। पर भाजपा तो इस मामले में सबको मात देती चली आ रही है। एडवोकेट राम जेठमलानी का नाम तो आपने जरूर सुना ही होगा। यह महाशय देश के बडे नामी वकील कहलाते हैं। सिर्फ रईसों के ही केस लडते हैं। गरीब इन तक पहुंचने की सोच ही नहीं सकते, क्योंकि इनकी कोर्ट में एक बार खडे होने की फीस ही पंद्रह से पच्चीस लाख रुपये तक है। जाहिर है कि बहुत मालदार हैं वकील साहब...। भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना इन पर हमेशा मेहरबान रही है। हद दर्जे के मतलब परस्त जेठमलानी जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने से भी नहीं चूकते। जब देश में राजग की सरकार थी और संत पुरुष श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब जेठमलानी को केंद्रीय मंत्री बनाया गया था। मंत्री पद पर रहते हुए इस शख्स ने ऐसी-ऐसी नौटंकियां कीं कि आखिरकार मंत्री की कुर्सी छिन गयी। तब जेठमलानी की बौखलाहट देखने लायक थी। अटल जी से खुन्नस खा चुके जेठमलानी ने बाद में अटल जी के खिलाफ लोकसभा चुनाव भी लडा और मुंह की खायी। रईस अपराधियों और देश के गद्दारों तक की पैरवी करने वाले जेठमलानी हद दर्जे के असभ्य अहंकारी और बदतमीज भी हैं। पता नहीं भाजपा की कौन-सी कमजोर नस उनकी मुट्ठी में है कि 'थाली छेदक' को दुत्कार के बदले उपहार ही मिलता चला आ रहा है। बताते हैं अटल जी से जबर्दस्त वैमनस्य रखने वाले जेठमलानी का भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी से गजब का याराना है जिसके चलते भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष गडकरी जेठमलानी को राज्यसभा की सदस्यता से नवाजने के लिए मजबूर हो गये। अस्सी वर्ष से ऊपर के हो चुके भाजपा के इस नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य ने मीडिया की तौहीन करके दिखा दिया है कि इनकी सनक मिजाजी और हेकडी जस की तस है। राम जाने यह शख्स राज्यसभा में कैसे-कैसे गुल खिलायेगा...। इस हकीकत से तो हर कोई वाकिफ है कि अपने यहां के न्यूज चैनल वालों को विवादास्पद चेहरों का साक्षात्कार लेना और दिखाना कुछ ज्यादा ही सुहाता है। इसी परिपाटी का पालन करते हुए स्टार न्यूज चैनल के दीपक चौरसिया जेठमलानी के राज्य सभा सांसद निर्वाचित होते ही साक्षात्कार लेने के लिए उनके निवास स्थान पर जा पहुंचे। जेठमलानी को गदगद होना चाहिए था कि मीडिया उनके जैसे सत्ता खोरों को खास तवज्जो देता है। पर ऐसा हुआ नहीं...।पत्रकार दीपक चौरसिया ने साक्षात्कार के दौरान जेठमलानी के अतीत और वर्तमान को लेकर कुछ ऐसे सवाल दाग दिये कि वे आग बबूला हो गये। उन्हें लगा कि यह पत्रकार किसी दुश्मन का भेजा हुआ कोई ऐसा दलाल है जो उनके मुखौटे को नोच डालना चाहता है। बडे-बडे गुंडे-बदमाशों और अपराधियों को अपने तर्कों के दम पर बरी करवा चुके वकील को सच की सुई ने इस कदर आहत कर दिया कि वे आपे से बाहर होकर अशिष्ट भाषा पर उतर आये- ''तुम सब मीडिया वाले असभ्य और जाहिल हो। जहां-तहां बिछ और बिक जाते हो। कांग्रेस के तो तुम जरखरीद गुलाम हो। इसलिए तुम जैसों को तो मैं देखना भी पसंद नहीं करता... तुम्हारी भलाई इसी में है कि फौरन मेरे घर से बाहर हो जाओ। नहीं तो...!''जेठमलानी की दुत्कार सुनने के बाद पत्रकार दीपक चौरसिया मुंह लटका कर बदतमीज सांसद के घर से बाहर निकल गये। परंतु जिन लाखों सजग लोगों ने पूरे तमाशे का जीता जागता चित्रण टेलीविजन पर देखा वे तो जेठमलानी और भाजपा को जी भरकर कोसते रह गये। पत्रकार दीपक चौरसिया का अहंकारी और सनकी सासंद के समक्ष चुप्पी साधे रहना किसी भी मीडिया प्रेमी को रास नहीं आया। लगता है वे अपने न्यूज चैनल पर जो तमाशा दिखाना चाहते थे उसे उन्होंने बेइज्जत होकर फिल्माया भी और दिखाया भी। यही उनका असली मकसद था। अधिकांश न्यूज चैनल वाले आजकल ऐसे ही पत्रकारिता कर रहे हैं। वाहियात नेता के समक्ष नामी-गिरामी पत्रकार की चुप्पी के भला और क्या मायने हो सकते हैं? क्या यह भी मान लिया जाए कि पत्रकार बंधु किन्हीं मजबूरियों के वशीभूत होकर अपनी खुद्दारी भी गिरवी रखते चले जा रहे हैं? भारतीय जनता पार्टी को जेठमलानी जैसे 'चेहरे' मुबारक हों। बेचारी की समझ में अब यह बात तो आने से रही कि किनकी वजह से उसके पांव के नीचे जमीन लगातार दरकती ही जा रही है...। जेठमलानी जैसे खरबपतियों को कुर्सियां बांटने वाली पार्टी के अध्यक्ष से कोई यह भी तो पूछे कि जनाब अगर आपकी पार्टी में पोस्टर लगाने वालों को तरजीह दी जाती है तो फिर जेठमलानी जैसे धनपतियों का भाजपा में वर्चस्व क्यों है? लोगों की यह धारणा कहां पर गलत है कि भाजपा थैलीशाहों का जमावडा है। इसके आगे और पीछे सिर्फ और सिर्फ थैलीशाह ही खडे हैं। अभी हाल में बिहार में मोदी के विज्ञापनों के प्रकाशन को लेकर जो हंगामा हुआ उसके पीछे का सच भी जान लीजिए। बिहार की राजधानी पटना में मोदी को प्रचारित करने वाले तमाम विज्ञापन सूरत के एक भाजपा सांसद के जरिए छपवाये गये थे। गुजरात में हुए सहकारी बैंक घोटाले के खलनायक रहे इस सांसद ने गुजरात के हीरा व्यापारियों से मोटी उगाही कर इन विज्ञापनों के बिल का भुगतान किया१ वैसे भी टाटा-बिडला और तमाम अंबानियों की जमात नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाये जाने की चाह व्यक्त करती रही है। इसी से समझा और जाना जा सकता है कि भाजपा को कितने...कितने पावरफुल धनबलियों का साथ मिलता चला आ रहा है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जैसों के शोर मचाने से क्या फर्क पडता है...

भाजपा तो है थैलीशाहों की पार्टी

जब से संघ की पसंद नितिन गडकरी ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कुर्सी पायी है तभी से पार्टी की इमारत धसकती-सी दिखायी देने लगी है। इस डगमगाती इमारत पर कई नेता अपना-अपना डंडा लेकर खडे हैं। डंडे में झंडा कहीं नजर नहीं आ रहा है। नितिन गडकरी भले ही यह कहते नहीं थक रहे हों कि भारतीय जनता पार्टी काम करने वालों की कदर करना जानती है और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वे स्वयं हैं जो कभी दिवारों पर पोस्टर चिपकाया करते थे और आज पार्टी के अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं। अध्यक्ष महोदय सच कहते हैं या झूठ यह भी खोज और शोध का विषय है।जिन्होंने भाजपा को बहुत करीब से देखा और जाना है उनका निष्कर्ष तो यही बताता है कि यह पार्टी रईसों की पार्टी है। इसमें सौदागरों की भरमार है। खाली जेब वालों की यहां कोई पूछ-परख नहीं होती। वैसे तो देश की लगभग हर राजनीतिक पार्टी का यह उसूल बन चुका है कि विधान परिषद और राज्यसभा में धन्नासेठों को ही पहुंचाओ और फटेहालों को दिलासा देकर मुंह ताकते रहने के लिए छोड दो। पर भाजपा तो इस मामले में सबको मात देती चली आ रही है। एडवोकेट राम जेठमलानी का नाम तो आपने जरूर सुना ही होगा। यह महाशय देश के बडे नामी वकील कहलाते हैं। सिर्फ रईसों के ही केस लडते हैं। गरीब इन तक पहुंचने की सोच ही नहीं सकते, क्योंकि इनकी कोर्ट में एक बार खडे होने की फीस ही पंद्रह से पच्चीस लाख रुपये तक है। जाहिर है कि बहुत मालदार हैं वकील साहब...। भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना इन पर हमेशा मेहरबान रही है। हद दर्जे के मतलब परस्त जेठमलानी जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने से भी नहीं चूकते। जब देश में राजग की सरकार थी और संत पुरुष श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब जेठमलानी को केंद्रीय मंत्री बनाया गया था। मंत्री पद पर रहते हुए इस शख्स ने ऐसी-ऐसी नौटंकियां कीं कि आखिरकार मंत्री की कुर्सी छिन गयी। तब जेठमलानी की बौखलाहट देखने लायक थी। अटल जी से खुन्नस खा चुके जेठमलानी ने बाद में अटल जी के खिलाफ लोकसभा चुनाव भी लडा और मुंह की खायी। रईस अपराधियों और देश के गद्दारों तक की पैरवी करने वाले जेठमलानी हद दर्जे के असभ्य अहंकारी और बदतमीज भी हैं। पता नहीं भाजपा की कौन-सी कमजोर नस उनकी मुट्ठी में है कि 'थाली छेदक' को दुत्कार के बदले उपहार ही मिलता चला आ रहा है। बताते हैं अटल जी से जबर्दस्त वैमनस्य रखने वाले जेठमलानी का भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी से गजब का याराना है जिसके चलते भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष गडकरी जेठमलानी को राज्यसभा की सदस्यता से नवाजने के लिए मजबूर हो गये। अस्सी वर्ष से ऊपर के हो चुके भाजपा के इस नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य ने मीडिया की तौहीन करके दिखा दिया है कि इनकी सनक मिजाजी और हेकडी जस की तस है। राम जाने यह शख्स राज्यसभा में कैसे-कैसे गुल खिलायेगा...। इस हकीकत से तो हर कोई वाकिफ है कि अपने यहां के न्यूज चैनल वालों को विवादास्पद चेहरों का साक्षात्कार लेना और दिखाना कुछ ज्यादा ही सुहाता है। इसी परिपाटी का पालन करते हुए स्टार न्यूज चैनल के दीपक चौरसिया जेठमलानी के राज्य सभा सांसद निर्वाचित होते ही साक्षात्कार लेने के लिए उनके निवास स्थान पर जा पहुंचे। जेठमलानी को गदगद होना चाहिए था कि मीडिया उनके जैसे सत्ता खोरों को खास तवज्जो देता है। पर ऐसा हुआ नहीं...।पत्रकार दीपक चौरसिया ने साक्षात्कार के दौरान जेठमलानी के अतीत और वर्तमान को लेकर कुछ ऐसे सवाल दाग दिये कि वे आग बबूला हो गये। उन्हें लगा कि यह पत्रकार किसी दुश्मन का भेजा हुआ कोई ऐसा दलाल है जो उनके मुखौटे को नोच डालना चाहता है। बडे-बडे गुंडे-बदमाशों और अपराधियों को अपने तर्कों के दम पर बरी करवा चुके वकील को सच की सुई ने इस कदर आहत कर दिया कि वे आपे से बाहर होकर अशिष्ट भाषा पर उतर आये- ''तुम सब मीडिया वाले असभ्य और जाहिल हो। जहां-तहां बिछ और बिक जाते हो। कांग्रेस के तो तुम जरखरीद गुलाम हो। इसलिए तुम जैसों को तो मैं देखना भी पसंद नहीं करता... तुम्हारी भलाई इसी में है कि फौरन मेरे घर से बाहर हो जाओ। नहीं तो...!''जेठमलानी की दुत्कार सुनने के बाद पत्रकार दीपक चौरसिया मुंह लटका कर बदतमीज सांसद के घर से बाहर निकल गये। परंतु जिन लाखों सजग लोगों ने पूरे तमाशे का जीता जागता चित्रण टेलीविजन पर देखा वे तो जेठमलानी और भाजपा को जी भरकर कोसते रह गये। पत्रकार दीपक चौरसिया का अहंकारी और सनकी सासंद के समक्ष चुप्पी साधे रहना किसी भी मीडिया प्रेमी को रास नहीं आया। लगता है वे अपने न्यूज चैनल पर जो तमाशा दिखाना चाहते थे उसे उन्होंने बेइज्जत होकर फिल्माया भी और दिखाया भी। यही उनका असली मकसद था। अधिकांश न्यूज चैनल वाले आजकल ऐसे ही पत्रकारिता कर रहे हैं। वाहियात नेता के समक्ष नामी-गिरामी पत्रकार की चुप्पी के भला और क्या मायने हो सकते हैं? क्या यह भी मान लिया जाए कि पत्रकार बंधु किन्हीं मजबूरियों के वशीभूत होकर अपनी खुद्दारी भी गिरवी रखते चले जा रहे हैं? भारतीय जनता पार्टी को जेठमलानी जैसे 'चेहरे' मुबारक हों। बेचारी की समझ में अब यह बात तो आने से रही कि किनकी वजह से उसके पांव के नीचे जमीन लगातार दरकती ही जा रही है...। जेठमलानी जैसे खरबपतियों को कुर्सियां बांटने वाली पार्टी के अध्यक्ष से कोई यह भी तो पूछे कि जनाब अगर आपकी पार्टी में पोस्टर लगाने वालों को तरजीह दी जाती है तो फिर जेठमलानी जैसे धनपतियों का भाजपा में वर्चस्व क्यों है? लोगों की यह धारणा कहां पर गलत है कि भाजपा थैलीशाहों का जमावडा है। इसके आगे और पीछे सिर्फ और सिर्फ थैलीशाह ही खडे हैं। अभी हाल में बिहार में मोदी के विज्ञापनों के प्रकाशन को लेकर जो हंगामा हुआ उसके पीछे का सच भी जान लीजिए। बिहार की राजधानी पटना में मोदी को प्रचारित करने वाले तमाम विज्ञापन सूरत के एक भाजपा सांसद के जरिए छपवाये गये थे। गुजरात में हुए सहकारी बैंक घोटाले के खलनायक रहे इस सांसद ने गुजरात के हीरा व्यापारियों से मोटी उगाही कर इन विज्ञापनों के बिल का भुगतान किया१ वैसे भी टाटा-बिडला और तमाम अंबानियों की जमात नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाये जाने की चाह व्यक्त करती रही है। इसी से समझा और जाना जा सकता है कि भाजपा को कितने...कितने पावरफुल धनबलियों का साथ मिलता चला आ रहा है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जैसों के शोर मचाने से क्या फर्क पडता है...

Thursday, June 17, 2010

मुसलमान कब तक होते रहेंगेराजनेताओं के छल-कपट के शिकार?

धिक्कार है उन राजनेताओं पर जो रंग दर रंग बदलते हुए गिरगिट को भी शर्मिंदा कर रहे हैं। लानत है उन पर जो अपने ही देशवासियों के साथ छल-कपट करने में कतई नहीं कतराते। उन पर भी लानत है जिनके लिए इस देश के मुसलमान सिर्फ और सिर्फ वोटर भर हैं। देश की राजनीति के प्रख्यात-कुख्यात दलाल अमर ि‍संह को इन दिनों मुसलमानों की बहुत चिन्ता सता रही है। हाल ही में उनका बयान आया है कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा मुसलमानों को बेवकूफ बनाया है और येन-केन-प्रकारेण उनके वोट हथियाने के मकसद को पूरा किया है। यह वही अमर सि‍ंह हैं जो चौदह वर्षों तक समाजवादी पार्टी में रह चुके हैं और पार्टी सुप्रीमो मुलायम qसह के हर फैसले में शामिल हुआ करते थे। पार्टी से धकियाये जाने के बाद अब उन्हें मुसलमानों के साथ होते चले आ रहे भेदभाव और अवहेलना की चि‍ंता इस कदर सताने लगी है कि मंचों पर भाषण देते-देते रुआंसे हो जाते हैं। उन्होंने अभी कोई राजनीतिक पार्टी तो नहीं बनायी, पर एक ‘मंच‘ (लोकमंच) जरूर बना लिया है जिसकी छाती पर सवार होकर किसी को कोसने और किसी को चूमने-चाटने का नाटक करते रहते हैं। राजनीति में बुरी तरह से पिटने के बाद फिल्मों में लटके-झटके दिखाने में लगे अमर सि‍ंह ने ऐलान किया है कि आगामी विधान सभा चुनाव जीतने के बाद उनका मंच किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बना कर ही दम लेगा। अमर सि‍ंह की तरह और भी बहुतेरे नेता हैं जो मुसलमानों को रिझाने और लुभाने के लिए शाब्दिक चारा फेंकते रहते हैं। अन्दर से भले ही मुसलमानों के प्रति कैसी भी सोच रखते हों पर ऊपर से सभी मुसलमानों के शुभqचतक दिखना चाहते हैं।बीते सप्ताह बिहार में गजब का नजारा देखने में आया। एक असली फोटो ने दंगल-सी हालत पैदा कर दी। बिहार में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल युनाईटेड मिल-जुलकर सरकार चला रहे हैं। तय है कि दोनों पार्टियों ने एकजुट होकर विधान सभा चुनाव लडा था और लालू प्रसाद यादव का पत्ता साफ करने में सफलता पायी थी। दोनों पार्टियों के नेता एक-दूसरे के अहसानमंद थे। नीतीश कुमार सफलता पूर्वक साढे चार साल से मुख्यमंत्री पद की कमान संभाले चले आ रहे हैं और कहीं न कहीं उनके मन में यह बात बैठ गयी है कि उन्होंने बिहार के लिए इतना कुछ कर दिया है कि लोग अब सिर्फ उनको देखकर ही सिर पर खडा अगला विधान सभा चुनाव जितवा देंगे। दूसरी तरफ भाजपा वालों ने भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। भाजपा के थके-हारे नेता लालकृष्ण आडवाणी भले ही बिहार का अगला विधान सभा चुनाव जनता दल इस युनाईटेड के साथ लडने की मंशा रखते हों पर नये भाजपा कप्तान नितिन गडकरी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी कोई अलग-सी खिच‹डी पकाने के फेर में हैं। भाजपा के तेजतर्रार नेता नरेंद्र मोदी अपने किस्म की राजनीति करने में विश्वास रखते हैं। बीते सप्ताह उन्होंने बिहार की जमीन पर पैर रखने से पहले बिहार के अखबारों में ऐसे विज्ञापन प्रकाशित करवा दिये कि नीतीश के तन-बदन में आग लग गयी। उस पुरानी फोटो ने उन्हें आगबबूला कर दिया जिसमें वे और नरेंद्र मोदी एक दूसरे का हाथ थामे विजयी मुद्रा में मुस्करा रहे थे। यह फोटो फर्जी नहीं असली थी। पर नीतीश कुमार के तो होश ही उ‹ड गये। उन्हें लगा कि भाजपा वाले उनके मुस्लिम वोटों पर डाका डालने की साजिश को अंजाम देने की फिराक में हैं। बिहार के मुस्लिम मतदाता दो यारों की लुभावनी फोटो को देखकर बहक न जाएं इसलिए नीतीश कुमार ने हंगामा ख‹डा कर दिया। गुजरात के नरेंद्र मोदी की यह मजाल कि वे बिहार में आकर तमाम अखबारों में ऐसी तस्वीर और ऐसी तकदीर छपवा दें जिससे उनके वोट बैंक पर नकारात्मक असर प‹डे और मुसलमान भाई बिचक जाएं। सवाल यह उठता है कि अगर नीतीश कुमार की निगाह में मोदी इतने साम्प्रदायिक हैं तो उन्होंने चहकते हुए मोदी के हाथ को अपने हाथ में लेकर वो फोटो क्या सोच कर qखचवायी थी? नीतिश कुमार के पास इतना बडा झूठ बोलने की गुंजाइश भी नहीं है कि वे कह सकें कि यह फोटो गोधरा कांड के पहले qखचवायी गयी थी। तय है नीतीश जब यह पोज दे रहे थे तब भी मोदी वही थे जो आज हैं। पर नीतीश बदल गये हैं। उन्हें बिहार के सोलह प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के हाथ से निकल जाने का भय सताने लगा है। नरेंद्र मोदी के छपवाये गये विज्ञापन में यह भी कहा गया कि संकट की घडी में गुजरात ही था जिसने बिहार की सर्वाधिक सहायता की। नीतीश इस सच्चाई को भी नहीं झेल पाये। उन्हें लगा कि उनके दोनों गालों को थप्पडों से लाल कर दिया गया है। नरेंद्र मोदी कोई साधु-संत तो हैं नहीं कि अवसर का फायदा न उठायें। उन्होंने वही किया जो अभी तक दूसरे शातिर नेता करते चले आ रहे हैं।यह मुसलमानों का दुर्भाग्य है कि उन्हें इस देश की हर पार्टी ने अपने मकसद के लिए ही इस्तेमाल किया है। यह भी मुसलमानों की बदनसीबी ही है कि इस देश में ऐसे ‘दलङ्क भी हैं जिनकी निगाह में अधिकांश मुसलमान गद्दार हैं। खाते हि‍ंदुस्तान की हैं और गाते पाकिस्तान की हैं। भारतीय मुसलमानों की छवि को बिगा‹डने में नेताओं का बहुत बडा हाथ है। मीडिया, लेखकों और चि‍ंतकों के एक वर्ग ने मुसलमानों की अनेक मनगढंत छवियां बनाने और पेश करने में कोई कसर नहीं छोडी। हि‍ंदुस्तान के एक जाने-माने पत्रकार और लेखक तो यह मानते हैं कि आम मुसलमानों का तबका आठ-दस बच्चे पैदा करने में विश्वास रखता है। परिवार नियोजन से उसका कोई लेना-देना नहीं है। इनके बच्चे गली-कूचों की गंदगी में खेलते रहते हैं और यह लोग अंधेरी, बदबूदार गंदी बस्तियों में इतने रम गये हैं कि उनसे बाहर निकलने के लिए हाथ-पैर मारना नहीं चाहते। देश के अधिकांश मुसलमान अपनी औरतों और बच्चियों को आज भी आधुनिकता के उजाले और शिक्षा से दूर रखना चाहते हैं। अपने आपको कुछ ज्यादा जानकार समझने वालों का यह भी कहना है कि मुसलमान धर्म के आधार पर मतदान करते हैं और उनकी यही कोशिश रहती है कि उनका वोट मुस्लिम प्रत्याशी को ही जाए।भारतीय मुसलमानों के बारे में और भी कई ऐसी ऊटपटांग बातें समय-समय पर प्रचारित होती रहती हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। असली सच तो यह है कि अपने देश में कुछ राह भटके मुसलमानों के कारण पूरे मुसलमानों की शक की निगाह से देखने वालों की कमी नहीं है। नरेंद्र मोदी जैसे नेता इन्हीं ‘शकीङ्क लोगों के नायक हैं। यह हकीकत है कि आप अगर किसी को शक की निगाह से देखेंगे तो वह भी आप पर विश्वास करने से कतराने लगेगा। आजादी के ६३ साल बाद भी मुसलमानों का बहुत ब‹डा वर्ग एक अजीब कश्मकश के दौर से गुजर रहा है। उनमें एकजुटता का घोर अभाव है। किसी भी दल के नेता ने कभी भी मुस्लिमों के हालात सुधारने के प्रयास नहीं किये। मुसलमानों के पास अपना ऐसा कोई मुस्लिम नेता नहीं है जो वाकई ईमानदार हो। अगर मुस्लिम नेता नेकनीयत के साथ अपने समुदाय का नेतृत्व करते तो कोई भी तथाकथित विद्वान मुसलमानों की तरह-तरह की छवियां ग‹ढने की जुर्रत नहीं कर पाता। न ही ‘दलालों‘ को मुसलमानों की झूठी तरफदारी करने का कोई मौका मिलता।

Thursday, June 3, 2010

शरणार्थियों की बस्ती

कुछ खबरें सोचने के लिए मजबूर कर ही देती हैं। आप लाख चाहें पर उन्हें नजर अंदाज नहीं कर सकते। उल्हासनगर की इस खबर को ही लीजिए जिसे प‹ढते ही मैं खुद को कलम चलाने से रोक नहीं पाया। मुंबई के निकट स्थित उल्हासनगर में तीन हजार से अधिक पत्रकार हैं! इनमें से अधिकांश पत्रकारों का एक सूत्रीय लक्ष्य हफ्ता वसूली का है। अधिकांश पत्रकार ऐसे हैं जो दिन भर अपने शिकार की खोज में लगे रहते हैं। जनजीवन से जुडी आम खबरों से उनका कोई वास्ता नहीं है। अपने वाहनों पर पत्रकार लिखकर घूमते ये शिकारी हमेशा इस बात की जानकारी लेने के लिए दौड-भाग करते रहते हैं कि शहर में कहां-कहां अवैध धंधे चल रहे हैं, अतिक्रमण हो रहे हैं और कौन-सी योजना के लिए कितना सरकारी फंड स्वीकृत हुआ है या फिर होने जा रहा है। अराजक तत्वों को आश्रय देना और उनसे हफ्ता वसूल करना इनका पेशा बन चुका है। महानगर पालिका, पीडब्ल्यूडी, सि‍चाई विभाग, आबकारी विभाग और पुलिस वालों से भी इन्हें नियमित देन मिलती रहती है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो किसी अखबार या न्यूज चैनल से नहीं जुडे हुए हैं फिर भी बडी ठसन के साथ खुद को पत्रकार बताते हुए अपना कामधंधा कर रहे हैं। इनकी आलीशान कारों पर पत्रकार का स्टीकर लगा देख बडी-बडी हस्तियां भी इन्हें सलाम करती हैं और झुक कर पेश आती हैं। शहर की हर धडकन से वाकिफ कुछ सज्जनों का कहना है कि उल्हासनगर में जब से अवैध निर्माणों और अवैध धंधों की बाढ आयी है तभी से गली-गली में पत्रकार और अखबार निकालने वाले पैदा हो गये हैं। छुटभइये किस्म के नेताओं बिल्डरों और शराब माफियाओं ने भी अखबारों का प्रकाशन शुरू कर दिया है और वे बडे फख्र के साथ संपादक और अखबार मालिक कहलाते फिरते हैं। यहां पर अखबार चलने और बिकने से तो रहे फिर भी अखबारों की संख्या बढती ही चली जा रही है। स्थानीय लोगों में इस बात की चर्चा है कि उल्हासनगर में हजार-दो हजार रुपये में प्रेस का कार्ड आसानी से मिल जाता है। जो प्रेस कार्ड खरीद लेता है वही पत्रकार बन जाता है और शिकार फांसने में लग जाता है। नकली सामान बनाने और फिर उसे पूरे देश में खपाने के लिए उल्हासनगर को जो कुख्याति हासिल हो चुकी है उसमें निरंतर इजाफा करने में लगे हैं कुकरमुत्तों की तरह उगते और फैलते ये पत्रकार। उल्हासनगर और उससे एकदम सटे कल्याण में से उन सि‍ंधियों का वर्चस्व है जो देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से यहां आये और बसाये गये थे। दाऊद और अरुण गवली की तर्ज पर आपराधिक गतिविधियां चलाने और देखते ही देखते अरबों-खरबों का साम्राज्य खडा करने वाले पप्पू कालानी जैसे लोग यहां की राजनीति में भी छाये हुए हैं। पप्पू कालानी मर्द मराठा शरद पवार की मेहरबानी से विधायक बनने का आनंद भी भोग चुके हैं। पप्पू की धर्म पत्नी ज्योति कालानी भी राजनीति तथा समाज सेवा के क्षेत्र में पति के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलती हैं। सत्ता और धन के बल पर पप्पू और ज्योति वो सारे गलत काम करते चले आ रहे हैं जिन्हें अवैध और अनैतिक माना जाता है। उल्हासनगर में ऐसे-ऐसे धनबलि और बाहुबलि हैं जो रातोंरात किसी का भी काम तमाम कर सकते हैं। प्रापर्टी और होटल व्यवसाय में लगभग इन्हीं की तूती बोलती है। मुंबई की तर्ज पर यहां के बीयर बारों और होटलों में जमकर देह व्यापार होता है जिसकी पुख्ता जानकारी पुलिस को भी रहती है और राजनेताओं को भी। पत्रकारों की तरह वे भी आंख, कान और मुंह बंद कर अपना काम करते रहते हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उल्हासनगर एक ऐसा टापू है जहां नेताओं, समाज सेवकों, गुंडे बदमाशों, पत्रकारों और पुलिस वालों के बीच ऐसा जबरदस्त गठजोड हो चुका है कि सारे मामले आपस में मिल बैठकर सुलझा और निपटा लिये जाते हैं। शाम होते ही कई पत्रकार आबकारी विभाग और पुलिस वालों के साथ दारू पीते देखे जा सकते हैं। मनपा के अधिकारियों का भी कई पत्रकारों से अटूट याराना है। दरअसल पत्रकार खबरी की भूमिका भी बखूब निभाते हैं। इसलिए हर किसी के काम आते हैं। पुलिस वालों को अवैध धंधो और धंधेबाजों की सूचना देकर अपना हिस्सा पाने वाले पत्रकारों का रूतबा भी देखते बनता है। खून-पसीना बहाने से परहेज करने वाले बेरोजगार नये-नवेले छोकरे भी इनसे प्रभावित हो रहे हैं। वे इन्हें अपना आदर्श मानते हुए इनके आगे-पीछे घूमते देखे जा सकते हैं। तय है कि शरणार्थियों की बस्ती का भविष्य बहुत उज्जवल है।