Thursday, August 5, 2021

बिल्लू बादशाह का साक्षात्कार

    दूसरों के रहमो-करम पर अपनी जिन्दगी बसर करने वालों के तर्क और विचार आपको स्तब्ध कर सकते हैं। उनके चेहरे पर शर्मिंदगी नहीं, अधिकार के भाव नज़र आते हैं। उनके विचार से किसी को भी उन्हें उपदेश और सीख देने का कोई हक नहीं।
    हमारे एक मित्र ने किसी दिन राह चलते एक हट्टे-कट्टे भिखारी को भीख मांगते देख टोक दिया कि हाथ-पैर सलामत होने के बावजूद भी तुम्हें भीख मांगते शर्म नहीं आती? मुफ्त की खाने की बजाय कहीं नौकरी क्यों नहीं कर लेते! भिखारी ने ऐंठते हुए पूछा, ‘क्या आप देंगे मुझे नौकरी? मैं अभी आपके साथ चलने को तैयार हूं। हां, भीख से मैं हर माह पंद्रह-बीस हजार रुपये बड़ी आसानी से कमा लेता हूं। इतने से तो एक धेला भी कम नहीं चलेगा।’’ मित्र को भिखारी के तन कर बोलने के तीखे अंदाज ने सन्न और निरूत्तर कर दिया। उन्हें अपने सामने हारा सा देखकर भिखारी यह सफाई और सलाह देने से भी नहीं चूका, ‘‘आप से ज्यादा मुझे मालूम है कि भीख मांगना हर पल नाक कटवाने और डूब मरने जैसा है। फिर भी मन मारकर मैं इसे कर रहा हूं तो मेरी भी कोई मजबूरी होगी श्रीमान...। माना कि आप सक्षम हैं, पढ़े-लिखे हैं लेकिन फिर भी बहुत सोच-समझ कर अपना मुंह खोला करें...।’’
    कुछ महीने पहले एक बड़ी रोचक खबर पढ़ी थी। अपने ही महानगर में बिल्लू बादशाह नाम का एक करोड़पति भिखारी रहता है। नामी-गिरामी लोगों के साफ-सुथरे इलाके में बनी सर्वसुविधा युक्त दस मंजिला इमारत में उसका अपना करोड़ों रुपये का सुसज्जित फ्लैट है। उसी भव्य इमारत के ऐन सामने तेजी से उछलते एक दैनिक समाचार पत्र का कार्यालय है। जहां पर एक से एक विद्वान पत्रकार, संपादक तथा मालिक विराजते हैं। अखबारों में बिल्लू की अमीरी के बखान ने उससे मिलने के लिए प्रेरित कर दिया। काफी दिनों तक मैं उससे मिलने के लिए इधर-उधर के जुगाड़ लगाता रहा तब कहीं जाकर उससे मिलने का अवसर मिल पाया। उसके यहां आने से पहले एकाएक मुझे अपने मित्र और उस हट्टे-कट्टे भिखारी के बीच हुई शाब्दिक उग्र मुठभेड़ की याद हो आयी। तभी मैंने ठान लिया कि बिल्लू बादशाह से कोई भड़काऊ सवाल नहीं करूंगा। मैं तो बस अपने अंदर के जिज्ञासु पत्रकार को ऐसे सवाल करने की ही छूट दूंगा जो उसके स्वाभिमान को कतई चोटिल न करें। बिल्लू बादशाह के विशाल शानदार फ्लैट के हालनुमा कमरे में लगे कीमती सोफे पर बैठने का इशारा कर उसका सुरक्षा गार्ड मुझे यह कहते हुए ओझल हो गया कि दादा अभी तैयार हो रहे हैं। आपको कुछ देर इंतजार करना होगा। वो इंतजार महज पांच-सात मिनट का ही था। एक दुबले-पतले जींस- टी शर्ट धारी शख्स ने सामने की गद्देदार कुर्सी पर बैठते ही बड़ी अदब के साथ नमस्कार करते हुए कहा, ‘‘क्षमा चाहता हूं, आपको इंतजार करना पड़ा। मुमताज भाई ने मुझे कुछ दिन पहले बता दिया था कि ‘जलती कलम’ के पत्रकार साहेब मिलने को उत्सुक हैं। सच कहता हूं, मैं तो अखबारों के संपादकों तथा पत्रकारों से मिल-मिल कर पक गया हूं। सभी के पास एक से सवाल होते हैं। फिर मैंने ऐसा कौन सा किला फतह कर लिया है, जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया...?’’
    ‘‘बिल्लू भाई, आपने जो कमाल किया है उसके लिए पहले तो मेरी बधाई और शुभकामनाएं स्वीकारें। मैं आपसे कोई भी ऐसा सवाल नहीं करूंगा जो घिसा पिटा हो। मैं तो आपकी संघर्ष गाथा देश और दुनिया तक पहुंचाना चाहता हूं, ताकि दूसरों को भी संघर्ष करने की प्रेरणा मिल सके।’’ मेरे स्पष्टीकरण ने बिल्लू के चेहरे पर जो चमक बिखेरी वो मुझे बहुत अच्छी लगी। उसने मुस्कुराते हुए किसी को आवाज देकर तुरंत गर्मा-गर्म कॉफी लाने को कहा। कॉफी की पहली चुस्की के साथ ही मैंने अपने प्रश्नों का पिटारा खोल दिया......
    ‘‘देश के नंबर वन धनवान भिखारी होने पर बिल्लू बादशाह को कैसा लगता है?’’
    ‘‘दिल बाग-बाग हो जाता है। वर्षों तक खून-पसीना बहाने के बाद मैं आज जहां पहुंचा हूं उसके चर्चे मुझे और मेहनत करने की प्रेरणा देते हैं। मुझे पक्का यकीन है कि ऊपर वाले ने बहुत सोच-विचार कर इन अजूबे टूट-फूटे हाथ पैरों के साथ मुझे इस धरती पर भेजा है। यह अगर दुरुस्त होते तो मैं भी कड़कती धूप में करोड़ों बेरोजगारों की तरह लंबी कतार में खाली पेट पसीना-पसीना होता नज़र आता।’’
    ‘‘बिल्लू बादशाह एक बात कहूं...बुरा नहीं मानना। ऊपर वाले ने अब आपको मालामाल कर ही दिया है तो अब आप अपनी राह बदल क्यों नहीं लेते! इन बेतहाशा आढ़े-तेढ़े हाथ-पैरों का किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज करवा कर सामान्य इंसान की तरह जीने का आपका मन नहीं होता? आपको पता होना चाहिए  कि अपनी अपंगता की नुमाइश कर भीख मांगना लोगों की संवेदनशीलता और दयालुता के साथ धोखाधड़ी और घोर अपराध है। देश में लाखों लोग हैं जिनके दोनों हाथ-पैर नहीं हैं फिर भी उन्होंने तो भीख का कटोरा नहीं थामा। उन्होंने तो अपने अथाह साहस तथा अटूट हिम्मत की बदौलत हतप्रभ कर देने वाली सफलताओं और बुलंदियों के शीर्ष तक पहुंच कर इंसान होने का वास्तविक अर्थ बताया है।......’’
    भावावेश में बिल्लू सेठ पर तीखा प्रहार कर मैंने खुद से किये वायदे की डोर को एक ही झटके में तोड़ने की भूल कर दी। मुझे अपनी बेसब्री पर गुस्सा आने लगा, बिल्लू बादशाह आग-बबूला हो उठा...
    ‘‘आप लोगों को दूसरों पर तीर चलाने में बड़ा मज़ा आता है। अधिकांश मीडिया वाले कितने दूध के धुले हैं, सारी दुनिया जानती है। वो जो सामने दैनिक ‘उजला दामन’ का कार्यालय है, उसकी असलियत तो आपको भी पता होगी। इन उजला दामन वालों ने अखबार की आड़ में पचासों काले-नीले-पीले धंधे जमा कर जो धोखाधड़ियां की हैं, क्या वे आपकी निगाह में अपराध नहीं?
    कोयले की खदाने, कंस्ट्रक्शन, ऊर्जा, ऑयल एंड गैस, मॉल, होटल्स, टेली कम्युनिकेशन, थर्मल प्लांट आदि-आदि के खरबों के धंधे, कारोबार ‘उजला दामन’ के प्रकाशन के पश्चात ही खड़े हो पाए हैं। मेरा दावा है कि यदि इन महाजुगाड़ू, गुंडागर्दी और भिखारी प्रवृत्ति के मालिकों के पास अखबार नहीं होता तो ये कहीं भी नजर नहीं आते। इन्होंने बैंकों से भी हजारों-करोड़ का लोन हथिया रखा है जो कभी भी डूब सकता है। वर्षों से ये चतुर खिलाड़ी बोगस कंपनियां बनाकर हजारों-करोड़ की टैक्स चोरी करते चले आ रहे हैं। अभी हाल ही में जब इन ठगों, लुटेरों के यहां आयकर का छापा पड़ा तो  इनके खरीदे हुए चेहरे शोर मचाने लगे कि ये तो लोकतंत्र के चौथे खम्भे का अपमान है। अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। इस सच को छिपाने की पूरी कोशिश की गयी कि इनके काले धंधों को बेनकाब करने के लिए ही छापे डाले गये हैं। अखबार से इस धरपकड़ का कोई लेना-देना नहीं। इन धूर्तों की तरह छल, कपट करने की तो मेरे जैसे मेहनतकश सोच भी नहीं सकते। जंगलों तथा किसानों की जमीनों को हड़पने वाले इन काले दामन वाले धनपशुओं के तमाम काले चिट्ठों से जनता भी वाकिफ है, लेकिन बेचारी अपनी मजबूरियों के बोझ तले दबी हुई है। वो जो सामने ‘उजला दामन’ की सात मंजिला इमारत तनी है...वो भी पूरी तरह से अवैध है लेकिन सरकार और प्रशासन अंधा बना हुआ है। इसी इमारत के पीछे गरीबों, बदहालों की सैकड़ों झोपड़ियों को प्रशासन ने बीते सप्ताह उजाड़ कर उन्हें बेघर कर दिया।’’
    ‘‘ अरे वाह, आपको तो सभी की सटीक खबर है। अब यह तो बताओ कि आप पढ़े कहां तक हो?’’
    ‘‘समाजशास्त्र में एमए किया है मैंने पत्रकार भाई, आप बताओ कि ये गुंडागर्दी नहीं तो क्या है कि कुछ शातिर लोग अखबार निकालते ही इसलिए हैं कि अपनी धौंस दिखाकर उद्योगपतियों, अफसरों, शासन-प्रशासन आदि को डराते-धमकाते रहें और वो सब पाते और हथियाते रहें जो इन्होंने सोच रखा है। कोई यदि इनके इशारे पर नहीं नाचे तो उसके खिलाफ मनमानी खबरें छाप-छाप कर उसकी नाक में दम कर देते हैं। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि शहर में ऐसे कुछ पत्रकार भी हैं जो दिवाली, दशहरा और 15 अगस्त के अवसर पर लिफाफा लेने के लिए मेरे यहां नियमित पहुंच जाते हैं। मैं भी कभी उन्हें निराश नहीं करता।
    ‘‘बादशाह अब किसी दूसरे विषय पर बातचीत करते हैं। मैंने सुना है कि तुमने भिक्षावृति को बढ़ावा देने के लिए स्कूल भी खोल रखा है?’’
    ‘‘सही सुना है आपने। लेकिन ये आरोप गलत है कि मैं किसी को भीख मांगने के लिए प्रेरित करता हूं। इसकी कमायी का आकर्षण ही अच्छे-अच्छों को कटोरा पकड़ा देता है। पिछले बारह वर्ष से मेरे द्वारा भिक्षा प्रशिक्षण विद्यालय का संचालन किया जा रहा है। मेरे यहां से शिक्षित-दीक्षित होकर निकले हजारों लड़के-लड़कियां देश भर के शहरों में भीख मांग कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। मेरे विद्यालय से कई मां-बाप अपनी बच्चियों को भीख मांगने की ट्रेनिंग दिलवाने के लिए दौड़े-दौड़े चले आते हैं। यह निकम्मे मां-बाप अपनी लड़कियों की कमायी पर ऐश कर रहे हैं। इनकी छोटी-छोटी लड़कियां सुबह घर से निकलती हैैं और रात को तभी घर लौटती हैं जब उनकी झोली में चार-पांच सौ रुपये जमा हो जाते हैं। जिस दिन कम भीख मिलती है उस रात को उन्हें भूखे सोने के साथ-साथ थप्पड़ों, घूसों और डंडों से पिटना पड़ता है।
    एक सच और भी बताना चाहता हूं कि यदि अधिकांश भीख मांगने वालों में शराब, भांग, चरस, गांजा पीने की लत न होती तो वे भी लाखों में खेल रहे होते। पत्रकार जी, अब आप विदायी लें। आज रविवार है। रात को मेरे फार्म हाऊस पर देशी-विदेशी न्यूज चैनल वालों का जमावड़ा लगने वाला है। आप भी चाहें तो आ सकते हैं। शराब, कबाब और शबाब का पूरा इंतजाम किया गया है। चैनलों के सवालों के जवाब देने के लिए मुझे तैयारी भी करनी हैं। अखबारों में अपने नाम की चमक और शोहरत देखने के बाद अब टीवी पर पूरी तरह से छाने की मेरी बारी है। अब मुझे यकीन होने लगा है कि मेरा नेता बनने का सपना भी जल्द पूरा होगा। विधायक, सांसद और मंत्री बनने की मेरी बड़ी तमन्ना है। मुझे पक्का भरोसा है कि आप लोगों के साथ और दुआ से मेरा ये सपना भी जरूर साकार होगा। वैसे भी दोनों काम हैं तो एक जैसे ही। यहां नोटों की भीख मांगनी पड़ती है, राजनीति में पूरे दमखम के साथ वोटों की भीख भी मांग लेंगे। फिर अपने पास वोट खरीदने के लिए धन की भी कोई कमी नहीं। आखिर अपने देश-प्रदेश के अधिकांश नेता इसी माया के चमत्कार से ही तो हर चुनाव में ‘विजयश्री’ का सेहरा बांधते चले आ रहे हैं...।

Thursday, July 29, 2021

अमीर आदमी

    वे सड़क किनारे ठेले लगाकर चाट, पोहा, आलू टिक्की, गोल गप्पे, चिल्ली पनीर, मिसल, मोमेज, चाउमिन, पास्ता आदि बेचते हैं। छोटी-छोटी पान दुकान वालों के भी अपने-अपने जलवे हैं। कई लोग इन्हें छोटा काम मानते हैं। इन्हें करने में उन्हें शर्म महसूस होती है। जब इन्होंने इन मामूली से लगने वाले काम धंधों की शुरुआत की थी तब इन्हें भी ऐसा ही लगता था। बड़ी पूंजी होती तो कपड़ा दुकान, रेडिमेड स्टोर, जनरल स्टोर, किराना शॉप या कोई बड़ा सा होटल, रेस्टारेंट खोलते और शान से गद्दी या काउंटर पर बैठकर अपना हुक्म चलाते। मजबूरी में प्रारंभ किये गये छोटे काम से जब नाम होने लगा, मोटी कमायी होने लगी तो बड़े-बड़ों की नजरें उन पर गड़ गयीं। आयकर विभाग भी चौकन्ना हो गया। पकौड़े, समोसे, मिसल, आमलेट, चिल्ली पनीर आदि के ठेले लगाने वाले तो ढेरों हैं, लेकिन डंका हर किसी का नहीं बजता। जब ‘स्वाद’ और व्यवहार की धूम मचती है, तभी ग्राहकों की कतारें लगती हैं। इस उपलब्धि के लिए खून-पसीना भी बहाना पड़ता है। लाज-शर्म को भी त्यागना पड़ता है।

    अभी हाल ही में कानपुर में लगभग ढाई सौ से अधिक ऐसे कबाड़ी ठेले और खोमचे वालों का पता चला है जो करोड़पति हैं। यकीनन यह करिश्मा उनकी अटूट मेहनत का प्रतिफल है। ऐसे करोड़पति देश के हर शहर में हैं। उनके पास आलीशान महंगी कारें हैं। रहने को बड़े-बड़े घर हैं। वे नियमित विदेश भी जाते हैं और उनके बच्चे बेहतरीन स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हैं। मोटी कमायी होने के बावजूद ये अमीर न आयकर देते हैं न जीएसटी। मैले-कुचैले रहकर धनकुबेर बन जाना सफेदपोशों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं। दो वर्ष पूर्व सरकार ने बेरोजगारों को पकौड़े, समोसे बनाकर बेचने की सलाह दी थी तो कई पढ़े-लिखों को बड़ा गुस्सा आया था। अपनी तौहीन लगी थी उन्हें यह सलाह। सरकार को निशाने पर लेकर खूब शोर मचाया गया था कि सरकार लोगों को रोजगार और नौकरी देने में असमर्थ है इसलिए ठेले, खोमचे लगाकर ऐसा काम करने का परामर्श दे रही है जो सम्मानजनक नहीं है।

    देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अपनी असली कमायी छुपाते हैं। उन्हें सुविधाएं तो चाहिएं, लेकिन टैक्स भरना मंजूर नहीं। आलीशान कोठियों में रहते हैं, लेकिन खुद को गरीब बताते हैं। उन्हें इतनी सी बात भी समझ में नहीं आती कि उनके बच्चों के स्कूल, कॉलेजों के खर्चे और उन्हें मुहैया कराई गई स्कूटर, मोटर सायकल तथा कारें कहां छिप पाती हैं। इन पंक्तियों के लेखक का कई टैक्स चोरों से मिलना-जुलना होता रहता है। उनके पास अपने-अपने तर्क और सबूत भी हैं। कोरोना काल ने तो उन्हें उनकी चालाकियों को जायज ठहराने के कई बहाने दे दिये हैं। उनकी शिकायत है कि जनता से वसूले जाने वाले अधिकांश टैक्स की रकम तो मंत्रियों, नेताओं और प्रशासकों के ठाठबाट पर खर्च हो जाती है। अपने यहां चंद राजनेता ही ऐसे हैं जिन्हें ईमानदार कहा जा सकता है। अधिकांश तो महा भ्रष्टाचारी हैं। इन्हीं की वजह से देश के विकास का पहिया रेंग-रेंग कर चल रहा है। सरकारी अस्पतालों में कैसी सुविधाएं हैं उसका सच सभी के सामने आ चुका। न पर्याप्त बेड और न ही आक्सीजन जैसी जरूरी सुविधाएं। पता नहीं कितने देशवासी तो कोरोना काल में सरकारी बदहाली के चलते चल बसे।
    विदेशों में तो सरकारें ही जनता की बीमारी का खर्च उठाती हैं, उनके बच्चों को शिक्षा दिलवाती हैं, बुजुर्गों, असहायों की भरपूर सहायता करती है, लेकिन भारत वर्ष में तो बस भर्राशाही और लूटमारी है। ऐसे में ईमानदारी से करदाता का धर्म निभाने का मतलब है भ्रष्टाचारी, लुटेरों की तिजोरी का और वजन बढ़ाते चले जाना। अगर सत्ताधीशों ने सजगता और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया होता तो कोई भी देशवासी अपनी आमदनी नहीं छिपाता। दिल खोलकर सभी टैक्स भरता। 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में मात्र डेढ़ करोड़ लोगों के करदाता होने की खबरें मीडिया में छा कर वतन की बदनामी नहीं करातीं।
    यह कलमकार इन शिकायतीबाजों से कुछ तो सहमत है, लेकिन पूरी तरह से समर्थन हर्गिज नहीं करता। इनमें से अधिकांश वो लोग हैं जिन्हें उनके ही स्वार्थ ने अंधा बना दिया है। इन्हें देश के गरीब और गरीबी नहीं दिखती। इन्होंने जो धन-दौलत कमायी है वो इसी देश के साधनों तथा मेहनतकश लोगों की बदौलत आयी है। मालदार बने रहने के लिए ये रईसों की जमात क्या-क्या नहीं करती। टैक्स बचाने के लिए चतुर-चालाक चार्टर्ड एकाउंटेंट की शरण में जाती है। बेनामी संपत्ति बनाती है। चुनाव के समय वोट देने में इन्हें शर्म आती है। जब सभी मतदान कर रहे होते हैं तब यह लोग छुट्टी मनाते हैं। कोई इनसे सवाल करे तो फटाक से कह देते हैं कि इस देश में कुछ भी नहीं बदलने वाला। इसे तो भ्रष्टाचारी नेताओं ने अपने कब्जे में कर रखा है। इन बददिमाग अहंकारी, आरामपरस्त लोगों की अक्ल के दरवाजे पता नहीं कब खुलेंगे। अरे, तुम्हीं तो हो जो अंतत: भ्रष्ट और बेइमान नेताओं को चुनाव में विजयी बनाते होे। तुम लोगों को तो खून-पसीना बहाने वालों का सम्मान करना ही नहीं आता। बस, टोपीबाजों के समक्ष ही नतमस्तक होते रहते हो।
    जब इज्जत और सम्मान की बात आयी है तो इस सच को भी क्या छिपाना कि अपने यहां दिवाला निकालने को भी काबिलियत और तरक्की की निशानी मानने वाले लोग भरे पड़े हैं। ये लोग दिवाला पीट चुके उन परिवारों से अपने लड़के-लड़की का रिश्ता जोड़ने में गर्व महसूस करते हैं जो दिवालिया हो जाते हैं। इनसे रिश्ता जोड़ने वालों को पता होता है कि कोई भी दिवाला निकालने वाला बेवकूफ नहीं होता। वह तो बैंकों तथा अपने लेनदारों को बेवकूफ बनाकर अपनी नींव मजबूत कर लेता है। बड़े-बड़े शहरों के बड़े-बड़े कारोबारियों, व्यापारियों, उद्योगपतियों के दिवालिया होने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। व्यापार जगत में जो इस कला में पारंगत नहीं उसका चंद्रकांत जैन जैसा हश्र कर दिया जाता है। गुजरात के शहर सूरत में बीते सप्ताह कर्ज के दो-ढाई लाख रुपयों का भुगतान नहीं कर पाने के कारण चंद्रकांत को निर्वस्त्र कर पहले तो साड़ी पहनायी गई फिर उसके हाथ में चोर लिखी तख्ती पकड़ा कर कपड़ा मार्केट में घुमाया गया। पचपन साल का अस्वस्थ व्यापारी किसी तरह से सिर झुकाये घिसट-घिसट कर चल रहा था। तमाशबीनों को बड़ा मज़ा आ रहा था। उन्हीं में से कुछ लोगों ने इस तमाशे की जीभरकर तस्वीरें खींचीं और वीडियो भी बनाये। इस भीड़ में कुछ ऐसे थोक कपड़ा व्यापारी भी शामिल थे, जिन्होंने कभी हाथ खड़े कर करोड़ों रुपये अंदर कर लिये थे। आज वे मार्केट में छाती तानकर चलते हैं। कई तो शहर छोड़कर गायब हो चुके हैं...।

Thursday, March 12, 2020

दंगों की आग में राख होने से बची पाती

वो आग लगा रहे थे, भीड को भडका रहे थे। उनके भाषणों में ज़हर भरा था। वे सब कुछ स्वाहा करने पर आमादा थे और इधर यह लोगों को मौत के मुंह में समाने से बचा रहे थे, उनके घर-परिवारों की हिफाजत में जी-जान लगा रहे थे। यह लोगों को बार-बार याद दिला रहे थे कि हिंसा से कभी भी किसी का भला नहीं हुआ। इसने तो हमेशा बरबादी का इतिहास रचा है...। भटको और बहकोगे तो अपना सबकुछ खो दोगे! जालिमों की भी‹ड से अलग हटकर खडे यह लोग दरअसल इन्सानियत के फरिश्ते थे, जो अपनी जान पर खेलकर भी सौहार्द का पैगाम देते हुए उपद्रवियों के हिंसक हौसलों को मात दे रहे थे। अगर इन्होंने अपनी जान को जोखिम में नहीं डाला होता तो दिल्ली के दंगों में मरने वालों का आंक‹डा और काफी बढ सकता था। हिंसा की आग चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। दोनों ही समुदाय के लोग एक दूसरे की जान लेने को उतावले थे। देश की राजधानी के करावल नगर में भी हर तरफ आग और दहशत पसरी थी। हर किसी को मौत का भय सता रहा था। तब ऐसे चिंताजनक माहौल में संजीव कुमार नामक युवक ने न सिर्फ एक मुस्लिम परिवार के २४ सदस्यों को अपने घर में पनाह देकर उनकी जान बचायी, बल्कि उसी परिवार की आठ महीने की गर्भवती महिला की तबीयत बुरी तरह बिगडने पर उसे बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। उपद्रवी भीड से बचाने के लिए संजीव ने पीडा से बेहाल उस मुस्लिम महिला का बुर्का उतरवाकर अपनी पत्नी के कपडे पहनाए और अपनी बाइक पर बिठाकर बचते-बचाते किसी तरह से अस्पताल पहुंचाया। रास्ते में मुस्लिम भीड ने उन्हें रोक कर घेरा भी, लेकिन संजीव ने जब हिम्मत दिखाते हुए मारने पर उतारू भीड को हकीकत से अवगत कराया तो भीड में शामिल लोगों ने उसे गले से लगा लिया।
विजयपार्क के इलाके में दोनों तरफ से पत्थरबाजी चल रही थी। उपद्रवी दुकानों को लूटने और जलाने की पुख्ता तैयारी के साथ आये थे। सबसे पहले उन्होंने दो दुकानों पर हमला किया, इसमें एक दुकान हिन्दू की थी, दूसरी मुस्लिम की, लेकिन स्थानीय हिन्दू-मुस्लिमों ने तय कर लिया कि इनकी खूनी मंशा किसी भी हालत में पूरी नहीं होने देनी है। उपद्रवियों की भीड में अधिकांश चेहरे अपरिचित थे, अनजाने थे, जो कहीं बाहर से आए थे। स्थानीय लोगों ने मिलजुलकर उनको खदेडने के लिए मोर्चा संभाल लिया। दंगाइयों ने तो सोच रखा था कि वे आसानी से अपना काम कर चलते बनेंगे, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम एकता से खौफ खाकर भाग खडे हुए। इस तरह से एक-दूसरे की मदद से पचास दुकानें लुटने और राख होने से बच गर्इं। दंगाइयों के आतंक और जुल्मो-सितम का मुकाबला करने के लिए कई हिन्दू-मुस्लिम अपने-अपने तरीके से इसी कोशिश में लगे रहे कि नफरत किसी भी हालत में जीतने न पाए। आपसी सद्भाव बचा रहे। एक फेसबुक मित्र ने अपनी चिन्ता और वेदना को इन शब्दों में व्यक्त किया, "भजनपुरा में मेरा घर है। मैं यहीं पैदा हुआ। जो पेट्रोल पम्प (दिल्ली डीजल्स) परसों जलाया गया, यही पेट्रोल पम्प २ नवंबर १९८४ में भी जलाया गया था। मैंने पहले भी एक सहमें हुए बच्चे के रूप में यहां से धुआं देखा था, इसलिए मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि यह कैसे भय से भर देता है। मेरा पूरा परिवार यहीं रहता है, मैं उनके लिए चिन्तित हूं। मेरे बहुत से विद्यार्थी इन्हीं इलाकों से आते हैं - मुस्तफाबाद, सीलमपुर, नूर-ए इलाही, भजनपुरा, चांद बाग, शिवपुरी, गोकुलपुरी... इनमें से बहुत से बच्चों के नाम मुस्लिम हैं, लडके भी और लडकियां भी। फिलहाल अपने इन सभी विद्यार्थियों से एक ही गुजारिश है कि नफरत को पहचानो, उसे भडकाने वालों को पहचानो, लेकिन जवाब में नफरत पनपने न दो। यह नफरत जान-बूझकर फैलाई जा रही है। यह सुनियोजित है। मुझमें १९८४ का जो सहमा हुआ बच्चा है उसकी ओर से २०२० के हर सहमे हुए बच्चे, बच्ची को ढेर मोहब्बतें भेजता हूं। दंगई हमें कभी न जीत पाएंगे।"
छह साल की मासूम बच्ची आलिया ने घर के आसपास बेतहाशा हिंसा देखी तो अपनी मां से पूछा कि यह लोग क्यों लड रहे हैं। डरी-सहमी मां ने कोई जवाब नहीं दिया। थोडी देर बाद मासूम ने अपने अब्बू की जलती दुकान देखी। मां ने कहा कि बेटा खिडकी बंद कर लो, हमें यहां से तुरंत भागना है। बच्ची ने झट से अपनी स्कूल की नोटबुक निकाली और छोटी सी कविता के रूप में हिंसा के दर्द को यह शब्द दे डाले :
"धरती है हम सबकी एक, पानी है हम सबका एक
पवन है हम सबकी एक, दुनिया में लोग अनेक, लेकिन सबकी दुनिया एक।"

अपने परिवार के साथ जान बचाकर जाते वक्त बेटी ने नोटबुक को अलमारी में रख दिया। दंगाइयों ने कुछ देर के बाद घर को आग लगा दी। पांच दिन बाद जले हुए घर में बच्ची की यह कविता लिखी नोटबुक एकदम सही सलामत मिली। उपरोक्त पंक्तियों ने हर शख्स को झकझोर दिया। आखें भी भिगों दीं। आलिया का पूरा परिवार दिल्ली छोडकर अपने मूल स्थान मुजफ्फरनगर जा चुका है। राजधानी अब उन्हें कितना भी बुलाये, ललचाये, लेकिन अब वे यहां कभी भी नहीं आएंगे। आलिया के परिवार की तरह हजारों परिवारों ने हमेशा-हमेशा के लिए दिल्ली को अलविदा कह दिया। सभी लोग रोजी-रोटी कमाने के लिए दिल्ली आए थे। दंगों ने उनके सभी सपनों की हत्या कर दी।
१९८४ के सिख विरोधी दंगों की तरह यह दंगे भी थम गये, लेकिन तब की तरह इस बार भी जबरन भेंट में मिले जख्मों का क्या...? सरकार ने भी मृतकों के परिवारों को पांच-दस लाख और घायलों को पच्चीस-पचास हजार देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, लेकिन जिन्होंने दंगों की आग को भोगा है, अपने करीबियों और पडोसियों को जलते और मरते हुए देखा है, उनके कभी भी खत्म नहीं होने वाले गम... दर्द की कौनसी कीमत और क्या हर्जाना दे पायेगी सरकार? दंगे के पंद्रह दिन गुजर जाने के बाद पत्रकारों के समक्ष सरोज नामक महिला के कहे गये शब्दों के भीतर छिपी चिन्ता, दहशत का इलाज शासकों की कोई धनराशि कर पाएगी? "दंगई भीड को मैंने बेहद पास से देखा था। भीड लाठी-डंडे लेकर मेरे घर के सामने चिल्ला रही थी। दंगई कभी पथराव तो कभी गोलियां चला रहे थे। यह सब देखने के बाद मैं रात में ठीक से सो नहीं पा रही हूं। ज़रा-सी आवाज होती है तो हडबडाकर उठ जाती हूं और जब सोती हूं तो सपने में भीड मुझे अपनी ओर आती दिखायी पडती है। यह किसी एक महिला की दास्तान नहीं है। हजारों स्त्री, पुरुषों, बच्चों को दंगों की हिंसा ने गहरा मानसिक आघात पहुंचाया है।" एक पीडिता का कहना था, उसने घरों में आगजनी देखी। इन घरों में बच्चों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें भी सुनीं। यह सब देखने-सुनने के बाद उसे अब रात में नींद नहीं आती। ऐसा लगता है कि कोई मेरा पीछा कर मार डालना चाहता है।

Wednesday, March 20, 2019

लोकतंत्र की जय...
काल मार्क्स कह गये हैं, सŸाा इंसान को भ्रष्ट बना देती है। कांग्रेस के नेता ने जयपुर के चिंतन शिविर में प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए बड़े बुझे मन से कहा था कि सŸाा तो जहर है। देश के एक केंद्रीय मंत्री अक्सर कहते देखे जाते हैं कि वे राजनीति में आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं। वे तो इतने अक्लमंद हैं कि अगर व्यापार कर रहे होते तो हर शाम 10 करोड़ रुपए लेकर अपने घर जाते और सुख की नींद सो जाते। अपने देश में कई राजनेता ऐसे हैं जो हमेशा यही दर्शाते नहीं थकते कि जनसेवा की भावना से ओतप्रोत होने के कारण उन्होंने राजनीति का दामन थामा है। उनसे जनता के कष्ट देखे नहीं जाते। वे हर किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं। जनसेवा के लिए उन्होंने हंसते-हंसते अपनी सभी इच्छाओं और सुख-सुविधाओं को भी कुर्बान कर दिया है।
दुनिया में ऐसा कौन सा इंसान है जो धन नहीं पाना चाहता? धनपति बनने की चाहत तो ताउम्र बनी रहती है, लेकिन सवाल यह है कि कितने लोग अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर धनपति बनते हैं? बड़ा ही आसान जवाब है। अधिकांश लोगों की यही मंशा होती है कि उन्हें धन पाने के लिए मेहनत ही न करना पड़े। अपराध के मार्ग पर चलने वाले लोगों को बहुत जल्दी धनपति बनते देखा जाता है। भ्रष्ट नौकरशाह और राजनीति के खिलाड़ियों के यहां भी देखते ही देखते दौलत का अंबार लग जाता है। भ्रष्टों के बारे में तरह-तरह की बातें होना आम बात है और यह भी आम बात है कि हर भ्रष्टाचारी सीना तानकर ईमानदार होने के दावे करता है। राजनेताओं की तो बात ही अलग है। वे खुद को खास समझते हैं। आम और खास लोगों के मसीहा। सभी को अपनी बातों के मक्कड़जाल में उलझाये रखते हैं।
जो सŸाा को ज़हर कहते हैं उनसे जब यह पूछा जाता है कि आप इस ज़हर से  मुंह क्यों नहीं मोड़ लेते। ज़हर को षहद की तरह सतत चूसने का मोह त्याग क्यों नहीं देते?... उनका जो जवाब होता है उसका यही अभिप्राय होता है कि हम दूसरों के लिए इस विष को पीते हैं। हम अपने देशवासियों को कष्ट में नहीं देख सकते। हमारे पूर्वजों ने देश सेवा का जो पाठ पढ़ाया है और दीन-दुखियों के कष्टों के निवारण की जो सीख दी है उससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते।
देशवासियों के मन में अगर झांका जाए तो वहां यही इबारत लिखी मिलेगी कि इस धरती पर नेताओं और सŸााधीशों से जहरीला, धूर्त, कपटी और विश्वासघाती और कोई प्राणी नहीं है। भारत के अधिकांष नेताओं और सŸााधीशों ने जनता को जख्म ही दिए हैं। इनके संपूर्ण सच से वाकिफ होने के बावजूद भी इनके नाटकों को देखने और शातिर बोल वचनों को चुपचाप सुनने के अलावा देशवासियों के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। खुद को सच्चा जनसेवी बताने वाले अधिकांष विधायक, सांसद, मंत्री तरह-तरह के कारोबार करते हैं। सिंचाई, लोकनिर्माण और सभी सरकारी ठेके इन्हीं के हिस्से में आते हैं, जिनसे यह करोड़ों-अरबों कमाते हैं। करोड़ों की सरकारी जमीनें कौड़ियों के भाव हथियाने वाले यह जनसेवक अनपढ़ होते हुए भी बड़े-बड़े इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के मालिक बन शिक्षा जगत का मजाक उड़ाते हुए रातों-रात मालामाल हो जाते हैं।
दरअसल भारत की राजनीति में तरह-तरह के व्यापारियों का वर्चस्व है, जिनके नंगे सच को भी नजरअंदाज करना पड़ता है। दलितों और शोषितों की मसीहा, जिन्हें बहनजी कहा जाता है उन्हें कौन नहीं जानता। वर्ष 2003 में उनकी कुल संपŸिा लगभग एक करोड़ रुपए के आसपास थी। 2012 में राज्यसभा का नामांकन भरते समय उन्होंने खुद अपनी संपŸिा 111 करोड़ घोषित की। ऐसी गगनचुम्बी तरक्की राजनीति के धंधे में ही संभव है। उनका कहना है कि उनके समर्थक उन्हें धन देते हैं। बहनजी से जब यह सवाल किया जाता है कि उन्हें जो चंदा और सहायता दी जाती है वह तो पार्टी के लिए होती है उनके निजी उपयोग के लिए नहीं....तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता। यह अकेले बहनजी की बात नहीं। देश में अधिकांश राजनीतिक पार्टियां ऐसे ही चल रही हैं। बिल्कुल व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह। यहां के कुछ चतुर-होशियार राजनेता शक्कर कारखाने स्थापित कर गन्ने से चीनी बनाने के बजाय एलकोहल तैयार करते हैं, जिसे बड़े-बड़े शराब व्यवसायियों को सप्लाई कर मोटी कमायी कर अपनी तिजोरी भरने के बावजूद खुद को असली राष्ट्रभक्त दर्शाते हैं। कुछ ही नेता ऐसे होंगे जिन्होंने आय से अधिक सम्पŸिा नहीं जुटा कर रखी होगी। भारतीय लोकतंत्र का असली मज़ा तो यही लोग लूट रहे हैं। दरअसल यह लोग हद दर्जे के घुटे हुए सौदागर हैं, जिन्होंने अथाह मालामाल होने के लिए राजनीति में घुसपैठ कर ली है। अच्छे लोग राजनीति से दूरी बनाये रहें इसलिये यह चतुर-होशियार चेहरे उन्हें डराते रहते हैं। देश इनके चंगुल में फंस कर रह गया है। बड़े-बुजुर्ग कहते भी रहे हैं कि जिस देश का राजा व्यापारी होता है वहां की प्रजा भूखी मरने को विवश होती है और जिस देश की सŸाा में चतुर कारोबारियों का वर्चस्व होता है वहां अमीर और अमीर तथा गरीब लगातार बरबाद होते चले जाते हैं। फिर अन्ततः एक दिन ऐसा भी आता है जब उन्हें अमीरों का गुलाम बनकर रह जाना पड़ता है।

Thursday, February 7, 2019

तालियों के हकदार

अक्सर ऐसा होता है। जब कोई हमारा दूर का रिश्तेदार, दोस्त सा परिचित गुज़र जाता है तो हम संवेदना व्यक्त करते-करते उसकी उम्र भी पूछ लेते हैं। जैसे ही हमें उसके उम्रदराज होने का पता चलता है तो हमारे दु:ख प्रकट करने का अंदाज बदल जाता है। अक्सर ऐसा भी होता है कि खबर देने वाला व्यक्ति भी बडी सहजता से यह कहता है कि उनकी  अच्छी-खासी उम्र हो चुकी थी। ऊपर वाले के लिखे को कौन बदल सकता है। यह बात भी अच्छी रही कि उन्हें अस्पताल का मुंह नहीं देखना पडा। ऐसा भी देखने में आता है कि जो लोग अपनी उम्र की नब्बे-पंचानबें वर्ष की दहलीज पार कर लेते हैं उनके स्वर्गवासी होने पर ज्यादा मातम नहीं मनाया जाता। उनके जिंदा रहते भी उनकी सोच, चाहत और भावनाओं की खास कद्र नहीं की जाती। इस मानवीय सोच को ताक पर रख दिया जाता है कि उनके भी अभी कई सपने अधूरे हो सकते हैं जिन्हें वे पूरा करना  चाहते होंगे। हमारे यहां जन्मजात दिव्यांगों को भी सहानुभूति के सिवाय कुछ नहीं मिलता। उनमें भी कुछ अलग हटकर करने का ज़ज्बा हो सकता है इसकी कल्पना ही नहीं की जाती। इसलिए उन्हें उस वातावरण और शिक्षा-दीक्षा से वंचित रखा जाता है, जो दूसरों को हंसी-खुशी दी जाती है। दुनिया में कितने ही ऐसे उम्रदराज और जन्मजात दिव्यांग हुए हैं और जिन्होंने आम इंसानी सोच पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे गलत साबित कर दिखाया है...
 उनका नाम है गुरूचरण सिंह। उम्र १०७ वर्ष। डिफेंस मिनिस्ट्री में सीनियर रिसेप्शन ऑफिसर थे। ३१ मार्च १९७१ को रिटायर हुए। कुछ दिन पूर्व उम्रदराज गुरूचरण के बाथरूम में गिरने से हीप में बायीं और फ्रेक्चर हो गया। उनके पोते उन्हें अस्पताल ले गए। डॉक्टरों को जब गुरूचरण की उम्र बतायी गयी तो वे असमंजस में पड गये। काफी देर तक वे आपस में सलाह करते रहे। अंतत: उन्होंने उनकी सर्जरी करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि अभी तक दुनिया में इस उम्र में किसी की सर्जरी नहीं हुई है। लेकिन गुरूचरण सर्जरी के लिए अड गए। उन्होंने अपने अच्छे स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा, 'मैं बेड पर लेटे रहना नहीं चाहता। जैसे मैं पूरी उम्र रहा हूं, वैसे ही अब रहना चाहता हूं। मुझे किसी पर आश्रित रहना कतई पसंद नहीं। बदनसीबी से ऐसे दिन कभी आए भी तो मर जाना पसंद करूंगा।' डॉक्टर उनकी जिद और सोच को देखकर हैरान रह गए। जब उनकी शारीरिक जांच की गई तो उन्हें पूरी तरह से फिट पाया गया। न ब्लड प्रेशर, न डायबिटिज, न ही वे कोई दवा ले रहे थे। आमतौर पर लंबी उम्र में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं लेकिन १०७ की उम्र में भी उनकी हड्डी में जरा भी कमजोरी नहीं आयी थी। उनकी जीने की ललक और फिटनेस से डॉक्टर बेहद प्रेरित हुए। पूरी टीम उत्साह और जोश के साथ सर्जरी की तैयारी में जुट गई। उनकी फिटनेस की वजह से एनेस्थीसिया दी गई और ४० मिनट में सर्जरी हो गयी। शनिवार को सर्जरी हुई। सोमवार को अपने पैरों पर खडे होकर वे अपने घर चल दिए। अस्पताल में उनकी चार पीढी के लोग साथ थे। उन्हें अच्छी तरह से चलते देख सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे। डॉक्टरों का दावा है कि इस उम्र में अनसिमेंटेंड इंप्लांट से हिप रिप्लेसमेंट की सफल सर्जरी कराने वाले गुरुचरण दुनिया के सबसे बुजुर्ग इंसान हैं। डॉक्टरों ने इस उपलब्धि को 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड  रिकॉर्ड' के लिए भी भेज दिया है।
जिस उम्र में बडे-बडे तुर्रमखां ज्यादा भागदौड करने से घबराते हैं उसी उम्र में यदि कोई हिमालय फतह करने का इतिहास रचे तो उसके आत्मबल और शौर्य को सलाम तो किया ही जाना चाहिए। केरल में स्थित त्रिशूर में निवासरत चित्रण नक्बूदिरी पाद कुछ ही महीने के बाद अपने जीवन के सौ साल पूर्ण करने जा रहे हैं। अब तक उन्नतीस दफे हिमालय की अलग-अलग चोटियों को अपने कदमों से नाप चुके हैं। चित्रण का अभी भी मन नहीं भरा है। इस उम्र में भी उनका इतना हिम्मती और साहसी होना लोगों को स्तब्ध कर देता है। वे पूरी तरह से शाकाहारी हैं। फल और सब्जियां खूब खाते हैं। नियमित योग व व्यायाम करना उनकी आदत में शुुमार हो चुका है। चित्रण कहते हैं कि मेरे लिए हर दिन मेरा जन्मदिन होता है। मैं उपलब्धियों का जश्न मनाता हूं। अगर आप खुद को उम्रदराज महसूस करेंगे तो खुद को थका हुआ पायेंगे। जीवन थकने नहीं चलने का नाम है।
कुछ लोग कमजोरी को अपनी ताकत बनाकर दुनिया पर राज करते हैं तो कुछ अपनी कमजोरी और कमी के बोझ तले दबकर अपना नामों-निशां ही मिटाकर रख देते हैं। किसी ने गलत नहीं कहा है कि जिसने खुद पर यकीन कर लिया उसने समझो सारा संसार ही जीत लिया। १९८२ में मेलबर्न आस्ट्रेलिया में जन्मे निकोलस जेम्स आज की तारीख में एक विश्वप्रसिद्ध मोटिवेशन स्पीकर हैं। करोडों की कमायी करने वाले निकोलस के हाथ-पैर नहीं हैं। टेट्रा समोलिया सिड्रोंम बीमारी की वजह से मां के गर्भ से ही निकोलस के हाथ-पैर का विकास नहीं हो पाया था। बिना हाथ-पैर वाले इंसान की कल्पना भी कंपा कर रख देती है। तय है कि निकोलस के लिए जीवन का सफर कतई आसान नहीं था। स्कूल में सहपाठी निकोलस की अपंगता का मजाक उडाते तो उनके पास आहत होने के सिवा और कोई चारा नहीं होता था। माता-पिता और भाई बहन ने अगर हौसला नहीं बढाया होता तो उन्होंने दस साल की उम्र में ही आत्महत्या कर ली होती। उन्हीं की प्रेरणा से परमात्मा पर विश्वास करते हुए नई सोच और नई दिशा की राह पकड ली। मनोबल बढाने वाले साहित्य के असंख्य पन्नों को पढने और आत्मसात करने के बाद उन्हें यह सच भी समझ में आ गया कि लोगों की बातों की परवाह करना बेवकूफी है। जीवन में जो कुछ होता है, किसी मकसद से होता है। भय ही मनुष्य की सबसे बडी विकलांगता है। अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाने वाले निकोलस ने सत्रह वर्ष की उम्र में खुद का ही एक एनजीओ, 'लाइफ विदाउट लिंब्स' शुरू किया। आज दुनिया के बेहतरीन मोटिवेशनल स्पीकर्स में से एक माने जाने वाले यह अद्भुत योद्धा चालीस से अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। निकोलस एक प्रभावी वक्ता, लेखक, संगीतकार और पेंटर भी हैं। उन्हें बेखौफ होकर तैराकी करते देख लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। हमेशा उमंग और जोश में रहने वाले निकोलस जब अपने भाषणों में यह कहते हैं 'उम्मीद को खोना हाथ-पैर खोने से ज्यादा बुरा है, तो तालियों की गडगडाहट से हजारों श्रोताओं से भरा सभागृह गूंज उठता है। जो शख्स अपनी पत्नी का हाथ पकडने में पूरी तरह से अक्षम हो उससे कौन युवती शादी करेगी? इसी सवाल और विचार को अपने मन-मस्तिष्क में बसाये निकोलस पर एक खूबसूरत युवती का ऐसा दिल आया कि वह उसके साथ शादी के लिए अड गई। आज वे न सिर्फ शादीशुदा है, बल्कि दो बच्चों के पिता भी हैं।

Friday, January 25, 2019

खता की सज़ा?


उस दिन रात के लगभग दस बज चुके थे। मैं सोने की तैयारी कर रहा था। तभी मोबाइल स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमका। मैंने फोन उठा लिया। उधर से आवाज आई, ‘‘अंकल मैं कोरबा से आपके पुराने मित्र अनिल सहगल का बेटा बोल रहा हूं। पापा नहीं रहे। परसों शुक्रवार को पगड़ी रस्म है।’’ मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही फोन बंद हो गया। मैं जानना चाहता था कि सहगल अचानक कैसे चल बसा। सहगल मेरा कॉलेज के जमाने का दोस्त था। हालांकि कॉलेज छोड़ने के बाद हमारा कभी मिलना नहीं हो पाया। उसके पिता लोहे के बहुत बड़े कारोबारी थे, लेकिन सहगल साहित्य प्रेमी था। अक्सर कहा करता था कि वह कभी भी व्यापार के क्षेत्र में नहीं जाएगा। बी-कॉम की पढ़ाई के दौरान ही उसकी लिखी कविताएं और गज़लें यहां-वहां की पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। वह प्रकाशित कविताओं की कटिंग को ऐसे संभाल कर रखता था जैसे वे कोई अनमोल खजाना हों। बी.कॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद हम अपने-अपने शहर चले गये। मैं बिलासपुर में एक दैनिक समाचार में नौकरी करने लगा। उसने कोरबा में बर्तन की दुकान खोल ली थी। वैसे यह सच्चाई हैरान करने वाली थी। कुछ वर्षों के पश्चात मैं रायपुर जाकर रहने लगा। वहां पर भी लगभग बारह वर्ष तक विभिन्न अखबारों की नौकरी बजायी। उसके पष्चात अपने अखबार के प्रकाषन के इरादे के साथ नागपुर जा पहुंचा। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये। बच्चों के भी बच्चे हो गये। अपने काम के अलावा किसी को याद करने का समय ही नहीं मिला।
सातेक वर्ष पूर्व किसी पत्रिका के पन्ने पलटते-पलटते उसमें छपी कविता, कवि के नाम और उसकी तस्वीर पर नज़र थमी की थमी रह गई। जिस अनिल सहगल को मैं भूल चुका था वह एकाएक जैसे मेरे सामने आ खड़ा हुआ। कविता के साथ छपी फोटो बता रही थी कि उसे कवि की जवानी के दिनों में खींचा गया है। उसके बाद तो मैं विभिन्न पत्रिकाओं और दैनिकों के रविवार अंक में छपने वाली कविताओं और गज़लों पर नजरें गड़ाये रहता। कभी-कभार उसकी लिखी कविता और गज़ल का दीदार हो जाता। इसी दौरान एक पत्रिका में उसका मोबाइल नंबर कविता के साथ नजर आया तो मेरी उससे बातचीत भी होने लगी। उसी ने बताया कि बर्तन की दुकान कब की बंद हो चुकी है। दोनों बेटे विदेष में नौकरी कर रहे हैं। माता-पिता भी स्वर्ग सिधार गये हैं। पिता की जमीन-जायदाद और खेती बाड़ी पर उसके तीनों भाइयों ने कब्जा जमा लिया है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में समय-समय पर होने वाले कवि सम्मेलनों में उसे सम्मान के साथ बुलाया जाता है और अन्य कवियों की तुलना में उसे मोटे लिफाफे मिल जाते हैं। शहर की मुख्य सड़क पर खुद का घर है, जिसकी कीमत आज करोड़ों में है। घर के ऊपर के चार कमरे किराये पर दे रखे हैं, जिससे हर माह दस हजार रुपये मिल जाते हैं। हम दोनों की बड़े मज़े से कट रही है। मोबाइल पर होने वाली बातचीत में अक्सर मुझे यही आास होता कि वह नषे में है। बात करते-करते वह बड़बड़ाने लगता था। कई बार तो आधी रात को उसका फोन आ जाता और अपनी नई कविता या गज़ल सुनाने लगता। कभी-कभी तो बच्चों की तरह जोर-जोर से रोता भी। सच कहूं तो मेरे लिए वह बहुत ही रहस्यमयी हो गया था।
बहुत सोचने-विचारने के बाद मैंने निष्चय कर लिया कि सहगल की पगड़ी रस्म में अवष्य जाऊंगा। रात की ट्रेन पकड़कर मैं सुबह छह बजे कोरबा पहुंच गया। पगड़ी की रस्म कहां होनी थी इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी। स्टेशन के पास स्थित होटल में दो-ढाई घण्टे तक आराम करने के बाद मैंने अपने एक परिचित पत्रकार मित्र से मिलने की ठानी। उसका मोबाइल नंबर मेरे पास नहीं था। नाष्ता करने के बाद मैं उसके कार्यालय जा पहुंचा। बहुत देर तक हम इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर मैं मुद्दे की बात पर उतर आया। उसे तो सहगल के गुजर जाने की जानकारी भी नहीं थी। मेरे काफी अनुरोध करने पर वह सहगल के घर चलने को तैयार हुआ। घर पहुंचे तो वहां ताला लगा था।
पड़ोसी ने बताया कि करीब स्थित धर्मशाला में दोपहर एक बजे पगड़ी रस्म की जाएगी। सहगल के पड़ोसी पत्रकार मित्र से वाकिफ थे इसलिए उन्होंने चाय पीने के लिए हमें रोक लिया। मित्र ने उन्हें मेरा परिचय देते हुए बताया कि ये सहगल की पगडी रस्म में शामिल होने के लिए नागपुर से यहां आए हैं। पड़ोसी वहीं के हाईस्कूल में शिक्षक थे। उनकी बातचीत के अंदाज से मुझे यह समझने में देरी नहीं लगी कि उन्हें सहगल के इस दुनिया को अलविदा कह जाने का कोई गम नहीं था। हमारे यहां जो गुजर जाते हैं उनकी बुराई करने से बचा जाता है, लेकिन शिक्षक तो जैसे सहगल के जीवन के सभी काले पन्ने खोलने की राह देख रहे थे। वह हद दर्जे का पियक्कड़ था। तब तक पीता रहता जब तक लुढ़क नहीं जाता। उसकी इसी आदत की वजह से पत्नी तीन साल पहले अपने बड़े बेटे के पास कनाडा चली गई। पत्नी के जाने के बाद उसने वेश्याओं को अपने घर लाना शुरू कर दिया था। कोई समझाता तो उसी पर बरस पड़ता। कोई उसके घर की तरफ झांकता तो गंदी-गंदी गालियां देने लगता। चौबीस घण्टे घर के खिड़की-दरवाजे बंद रखता। नषे में चीख-चीख कर यही कहता रहता कि इस शहर के सभी लोग मेरी जान के दुश्मन हैं। मेरी हत्या करने की साजिषें रची जा रही हैं। शराब और शबाब के चक्कर में वह कहीं का न रहा। अच्छा-खासा घर था वो भी बिक गया। पिछले सात-आठ महीनों से वह धर्मशाला के एक छोटे से कमरे में रह रहा था। पहले अंग्रेजी पीता था, अब देसी चढ़ाने लगा था। धर्मशाला वाले भी उसे वहां से खदेड़ने की तैयारी में थे। उसके मरने की वास्तविक तारीख किसी को पता नहीं है। कमरे से वह चार-पांच दिन से बाहर नहीं निकला था। वैसे ऐसा अक्सर होता था। धर्मशाला में ठहरे कुछ मुसाफिरों ने प्रबंधकों को कमरे से दुर्गंध आने के बारे में बताया तो कमरे का दरवाजा तोड़ा गया। सहगल बिस्तर पर मरा पड़ा था। चारपाई के नीचे खाली देसी षराब की बोतलें बिखरी पड़ी थीं। षिक्षक महोदय और भी बहुत कुछ बताना चाहते थे, लेकिन हम वहां से निकल लिए।
दोपहर के सवा एक बजे तक हम दोनों धर्मशाला के उस हॉल में पहुंच गए जहां पर सहगल की पगड़ी रस्म आयोजित थी। मुझे यह देखकर बेहद धक्का लगा कि वहां पर पंडित जी, सहगल के बेटे के अलावा दो और लोग ही बैठे थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छह लोग! हम दोनों ने सहगल की तस्वीर पर फूल चढ़ाये और वहां बैठ गए। पंडित जी दो बजे तक इस इंतजार में बैठे रहे कि कुछ और लोग आ जाएं तो पगड़ी की रस्में पूरी की जाएं, लेकिन उपस्थितों का आंकड़ा नहीं बढ़ पाया। आखिरकार सहगल के बेटे के अनुरोध पर पंडित जी ने बड़े बुझे मन से पूजा-पाठ कर कुछ मंत्र पढ़े और दक्षिणा का लिफाफा लेकर चलते बने। विदा लेते समय सहगल के बेटे के चेहरे पर जो पीड़ा और षर्मिंदगी देखी वह कई दिनों तक व्यथित करती रही। उसकी आंखों में ठहरे आंसू मुझे भिगोते रहे। अब भी जब कभी उस मनुष्य की याद आती है तो सहगल पर बहुत गुस्सा आता है। वह तो चला गया, लेकिन बेटे को उम्र भर की सज़ा दे गया! पांच साल से ज्यादा का समय बीत गया है सहगल को इस दुनिया से विदा हुए। आज एकाएक सहगल की याद आने की वजह है शहर के सभी दैनिक अखबारों में प्रकाषित यह खबर जो हर संवेदनषील पाठक को स्तब्ध और मुझे उसकी याद दिला उदास कर गयी: ‘‘महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में मंगलवार की दोपहर में उम्रदराज भाई-बहन के शव घर में मिले। उनका पालतू श्वान भी मरा हुआ पाया गया। तीनों की चार से पांच दिन पहले मृत्यु होने का संदेह है। षवों का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का कहना है दोनों भाई-बहन के पेट में एक दाना तक नहीं था। यानी उनकी मौत भूख की वजह से हुई थी। जबकि घर में आठ ड्रमों में अनाज भरा पड़ा था। यह भी काबिलेगौर है कि भाई के खाते में 36 लाख और बहन के खाते में एक लाख तीस हजार जमा थे। बिना प्लास्टर के जर्जर से दिखने वाले घर की कीमत भी दस करोड़ से ज्यादा है। दोनों भाई-बहन बहुत ही कम घर से बाहर निकलते थे। किसी को घर के भीतर आने नहीं देते थे। पता नहीं किस वजह से दोनों भयभीत रहते थे। सड़क और  भीड़-भाड़ वाले रास्तों पर चलने से बेहद घबराते थे। अपने पड़ोसियो से कभी भी उन्हें बात करते नहीं देखा गया। मिलना-जुलना तो बहुत दूर की बात है। इंसानों से दूरी बनाकर रखने वाले ये भाई-बहन जानवरों के बहुत करीब थे। एक समय ऐसा भी था जब बस्ती में घूमने वाले ष्वानों के लिए प्रतिदिन पचास लीटर दूध खरीदकर उन्हें पिलाया करते थे। उन्होंने घर में भी बीस श्वान पाल रखे थे। कुछ समय बाद उनके पास दो ष्वान ही बचे रह गए, जिसमें से उनकी मौत के साथ एक की मौत हो गई, दूसरा अंधा और बेहरा था जो बेहोशी की हालत में मिला। उनके घर के कमरों को देखकर लगता है कि जैसे वहां पर भूत रहते रहे हों! उनकी मौत के बाद भी कोई रिश्तेदार सामने नहीं आया। तालाबंद घर में हुई भाई-बहन की रहस्यमयी मौत चर्चा का विषय बनकर रह गई है।’’

Thursday, September 8, 2011

ऊंट आया पहाड के नीचे?

कारण चाहे जो भी हों पर राहत देने वाली बात तो जरूर है कि देश में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ माहौल बन चुका है। दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार के कानों पर भी जूं रेंगने लगी है और एक-एक कर देश के लुटेरों को सलाखों के पीछे पहुंचाया जाने लगा है। राजनीति के कुख्यात दलाल अमर सिं‍ह की तिहाड जेल रवानगी से यह संदेश भी देने की कोशिश की गयी है कि देर है पर अंधेर नहीं...। हालांकि इसके पीछे भी बहुत बडी राजनीति देखी जा रही है। पिछले कई वर्षों से कर्नाटक में अपनी दादागिरी की बदौलत सामानांतर सरकार चलाते चले आ रहे खनन माफिया रेड्डी बंधुओं पर भी आखिरकार सीबीआई के शिकंजे ने असर दिखाया है और उन्हें भी जेल में डाल दिया गया है। रेड्डी बंधुओं और अमर सिं‍ह में ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों ही राजनीति के माथे का ऐसा कलंक हैं जिनकी जडें बहुत गहरे तक समायी हैं। ऐसे ही दुष्टों और बेइमानों के कारण ही कई लोग राजनीति को वेश्या का दर्जा देने में नही हिचकिचाते। नेताओं का नकाब ओडकर खुले आम डकैती करने वाले रेड्डी बंधुओं को प्रारंभ से ही भारतीय जनता पार्टी का साथ मिलता चला आ रहा है। अब जब वे जेल भेजे जा चुके हैं तो पार्टी के दिग्गजों की सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो चुकी है। उन्हें यह भय भी सता रहा है कि कहीं रेड्डी बंधुओं के समर्थक विधायक बगावत पर उतरने के बाद मौजूदा कर्नाटक सरकार की ही धराशायी न कर दें। वैसे यह खतरा तो है ही। जो भ्रष्टाचारी सरकार बनाने में मददगार हो सकते हैं वे अपना बुरा वक्त आने पर भट्ठा भी बिठा सकते हैं। रेड्डी बंधु और अमर सिं‍ह जैसे अवैध करोबारी राजनीतिक गलियारों में विचरण करने वाले ऐसे सांप हैं जो दूध पिलाने वाले को भी काटे बिना नहीं रहते। यही इनकी असली फितरत है जिसे राजनीति के बडे-बडे खिलाडी जानते समझते तो हैं पर उनका इनके बिना काम भी नहीं चलता। आडे वक्त के लिए इन खोटे सिक्कों को संभाल कर रखना उनकी मजबूरी है। कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में बडे-बडे राजनेताओं की शह पर अवैध उत्खनन कर हजारों करोड रुपये के वारे-न्यारे कर चुके रेड्डी बंधुओं के यहां मारे गये छापे में केवल ३० किलो सोना और चार-पांच करोड नगद बरामद हुए। देखा जाए तो यह कुछ भी नहीं है। जो धनपशु एक मंदिर में आठ सौ हीरों का जडा मुकुट और स्वर्ण जडि‍त करोडों की साडी अर्पित कर सकते हैं उनके लिए यह रकम कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए मंदिरों में करोडों का चढावा चढाने और नौकरशाही को मुंहमांगी थैलियां देने में ज्यादा फर्क नहीं है। उनके यहां से अरबों-खरबों की दौलत बरामद होनी चाहिए थी। इससे ज्यादा माल तो आजकल शहरों के सरकारी ठेकेदारों के यहां मारे गये छापों में ही बरामद हो जाता है। सरकारों को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले रेड्डी बंधुओं के पास कितनी काली दौलत होगी इसका अता-पता तो उन्हें भी नहीं होगा। ऐसे में सीबीआई तो क्या दुनिया की कोई भी जांच एजेंसी इन खनिज माफियाओं की लुकी-छिपी अथाह दौलत के असली ठिकानों का पता नहीं लगा सकती।डकैती और हेराफेरी में चंदन तस्कर विरप्पन को मात देने वाले रेड्डी बंधुओं को अगर राजनीति का मुखौटा पहनने का अवसर न मिला होता तो ये लोग बहुत पहले ही सरकारी मेहमान बना कर जेल भिजवा दिये गये होते। देश के तमाम शातिर लुटेरे इस हकीकत से बहुत जल्दी वाकिफ हो जाते हैं कि यदि उन्हें बेखौफ होकर अपने काले धंधों को अंजाम देते रहना है तो राजनीति और सत्ताधारियों का दामन थामना ही होगा। कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगडे यदि इन डकैतों का पर्दाफाश नहीं करते तो यह अभी तक खुली हवा में सांस ले रहे होते। बिलीकोरे बंदरगाह से ३५ लाख टन लौह अयस्क रातों-रात गायब करने का कीर्तिमान रच चुके रेड्डी बंधुओ के समक्ष दुनिया की सबसे बडी प्रख्यात स्टील निर्माता कंपनी आर्सेलर मित्तल लिमिटेड भी कोई मायने नहीं रखती। लक्ष्मी मित्तल देश और दुनिया के जाने-माने उद्योगपति हैं और उन्होंने यह मुकाम खून-पसीना बहाकर हासिल किया है। रेड्डी बंधुओं ने तो देश की बहुमूल्य खनिज सम्पत्ति की हेराफेरी कर हजारों करोड का साम्राज्य खडा किया है। हराम की कमायी करने वाले किस तरह से अंधाधुंध दौलत लुटाते हैं उसे जानने के लिए यह जान लेना भी जरूरी है कि रेड्डी बंधु सोने की जिस कुर्सी पर विराजमान होते हैं उसकी कीमत है ढाई करोड। जिस सोने की प्रतिमा के समक्ष सिर झुकाते हैं वह तीन करोड की है। घर में खाने-पीने के जो बर्तन हैं वो भी सोने के हैं। सैर-सपाटे के लिए इन रईसों के पास चार हेलिकॉप्टर हैं। राजसी ठाठ-बाट वाला यह जलवा देश के लुटेरों की असली नीयत को बयां कर देता है। सत्ता के दलाल अमर ‍सिं‍ह की भी कुछ ऐसी ही दास्तां है। वे किसी जमीन में फकीर थे। राजनेताओं से नजदीकियां बढाने के बाद देखते ही देखते मालामाल हो गये। उनके जेल जाने पर किसी को भी हैरानी नहीं हुई।सत्ता के इस दलाल की भी वर्षों पहले जेल रवानगी हो गयी होती पर कुछ राजनेताओं ने इसे सतत बचाए रखा। सत्ताधारियों को ब्लैकमेल करने में माहिर अमर सिं‍ह ने उद्योगपतियों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों से दोस्ती-यारी कर जो अरबों-खरबों रुपये कमाये उसका काला-चिट्ठा मीडिया के द्वारा कई बार उजागर किया गया पर उनका बाल भी बांका नहीं हो पाया। 'कैश फॉर वोट' कांड के नायक रहे अमर सिं‍ह ने राजनीति के मैदान में सर्कसबाजी कर न जाने कितनी दौलत कमायी। अपनी इस अथाह काली माया को सफेद करने के लिए पचासों फर्जी कंपनियां भी खडी कीं। कार्पोरेट घरानों को प्रलोभन देकर राजनेताओं और उनकी पार्टियों के लिए चुनावी फंड जुटाने वाला ऊंट अब पहाड के नीचे आ चुका है। देखें क्या होता है...। वैसे अमर सिं‍ह आसानी से हार मानने वालों में नहीं हैं। कई राजनीतिक दिग्गजों के रहस्य उनकी मुट्ठी में कैद हैं। क्या पता क्या धमाका कर गुजरें। धमाका तो रेड्डी बंधु भी कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने भी जो खनन डकैतियां की हैं उनमें वे अकेले नहीं थे। न जाने कितने और सफेदपोश भी उनके साथ शामिल थे। तभी तो उन तमाम सफेदपोशों के चेहरों के रंग भी उड चुके हैं।

Thursday, July 1, 2010

यही सच है...

जमाना कितना भी बदल गया हो पर एक सच्चाई अपनी जगह पर डटी हुई है। शरीफ लोग पुलिस वालों की छाया से भी दूर रहना चाहते हैं। यदि बदकिस्मती से किसी शरीफ का खाकी वर्दी वाले से पाला पड जाए तो वह अपनी जेब हल्की कर उसके चंगुल से बचकर खिसक जाने में ही अपनी भलाई समझता है। इसलिए तो यह भी कहा जाता है कि खाकी से भगवान बचाये रखे। दरअसल हिन्दुस्तान की पुलिस की छवि ही कुछ ऐसी है कि आम जन उससे खौफ खाते हैं। बिगडे नवाबों, गुंडे बदमाशों, नेताओं, बलात्कारियों लूटेरों, हत्यारों को सहलाने वाली पुलिस में कर्तव्यनिष्ठ चेहरों का नितांत अभाव है। जिन लोगों का कभी भूले से पुलिस वालों से वास्ता पडता है वे इसकी असलियत बताने से भी नहीं चूकते। पर ऐसा कम ही देखने में आया है कि किसी पुलिस वाले ने ही पुलिस के काले सच का चेहरा उजागर करने का साहस दिखाया हो। न जाने कितने खाकी वर्दी वाले ऐसे भी होंगे जिनका पुलिस महकमें में रहकर दम घुटता होगा। तय है कि उन्हें अंधरेगर्दी, अराजकता, गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार का वो वातावरण रास नहीं आता होगा जो वर्षों से भारतीय पुलिस का अंग बन चुका है। अपना घर-परिवार चलाने की मजबूरी के चलते पुलिस विभाग के खूंटे से जबरन बंधे रहने वालों की भीड में से बाहर निकलने का साहस दिखाना यकीनन कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। यहां हम योगेश प्रताप िसंह का जिक्र कर रहे हैं जिन्होंने लगभग छह वर्ष पूर्व भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी को लात मार कर किनारा कर लिया था। सन १९८५ बैच के इस आईपीएस अधिकारी को पुलिस विभाग में व्याप्त भर्राशाही, अंधेरगर्दी, भ्रष्टाचार और राजनेताओं की दखलअंदाजी ने इस कदर बेचैन और आहत कर डाला कि उनका दम घुटने लगा था। उन्होंने देश की सेवा के लिए संविधान की रक्षा की शपथ ली थी। पर यहां तो शपथ का ही उपहास उ‹डाया जा रहा था। कानून के रखवाले कानून की धज्जियां उडा रहे थे। योगेश प्रताप ि‍संह जिन सपनों को पूरा करने के लिए पुलिस में भर्ती हुए थे उन्हें टूटने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। वे किसी भी हालत में स्वयं को उन वर्दीवालों में शामिल नहीं कर पाये जिन्होंने हालातों से समझौता कर अपनी खुद्दारी का गला तक घोटकर रख दिया था। उसी दौर में उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसमें महाराष्ट्र के नेताओं, मंत्रियों, पुलिस अधिकारियों और माफियाओं के शर्मनाक गठजोड का ऐसा स्पष्ट खुलासा किया कि सत्ता और नौकरशाहों के गलियारों में खलबली मच गयी। कई कफनचोर पुलिसिये बौखला उठे। ऐसा होना जायज भी था क्योंकि सच बेहद कडवा होता है। उसकी कडवाहट और चुभन तब और भी विषैली हो जाती है जब अपने ही बीच का कोई साथी खडा हो जाता है और सच कहने का अभूतपूर्व साहस कर गुजरता है।हां यह योगेश प्रताप सि‍ंह का साहस ही था कि उन्होंने बेखौफ होकर लोगों को बताया कि ऊपर से कडक और दबंग दिखने वाले अधिकांश पुलिस अधिकारी सफेदपोश नेताओं के हाथों के खिलौने भर हैं। मंत्री इन्हें जैसा नचाते हैं यह वैसा ही नाचते हैं। कानून-वानून से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस की नौकरी पाने से लेकर मनचाहा थाना हथियाने तक के लिए बोलियां लगती हैं। जो जितनी मोटी थैली मंत्रीजी के चरणों में चढाता है वो उतना ही बडा पद आसानी से पा जाता है। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की पुलिस विभाग में कोई कद्र नहीं है। बडे अफसरों और राजनेताओं के इशारों पर नाचने वाले पुलिस वालों को तरक्की पर तरक्की मिलती चली जाती है। योगेश प्रताप सि‍ंह ने खाकी वर्दी पहनने के साथ ही कसम खायी थी कि चाहे कुछ भी हो जाए वे रिश्वत नहीं लेंगे। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। उनकी यही जिद उनकी तरक्की में बाधा बनती रही। वे जब धन लेते ही नहीं थे तो देते कहां से? ऐसे में उन्हें नालायक मान लिया गया और उनकी अवहेलना की जाने लगी। मंत्रीजी की कृपा से उनके साथ के आईपीएस अधिकारी आईजी बना दिये गये और उन्हें प्रमोशन से कोसों दूर रखा गया। इसी पुलिस विभाग में जैसे-तैसे लगभग बीस वर्ष तक काम करते-करते उन्हें कुछ इस तरह के झटके भी झेलने पडे कि जिस अफसर के खिलाफ उन्होंने जांच की और दोषी पाया उसी को ऊपर वालों की मेहरबानी से उनका बॉस बना दिया गया। जिन अराजक तत्वों, अपराधियों और माफियाओं को उन्होंने सरे बाजार पीटा और हथकडि‍यां पहनायीं वही कालांतर में नेता का चोला पहनकर विधायक, सांसद और मंत्री बने। ऐसे काले-कलूटे अतीतधारियों को सलाम ठोकना और जी हजूरी करना इस जि‍ंदादिल शख्स के उसूल के खिलाफ था। ऐसे में एक स्वाभिमानी इंसान को जो रास्ता चुनना चाहिए वही योगेश प्रताप सि‍ंह ने भी चुना। उन्होंने जब इस्तीफा दिया था तब मैंने यह लिखा था कि 'योगेश प्रताप सि‍ंह का पुलिस की नौकरी को लात मारना एक तरह से पलायन भी है। यह पलायन उन धनपशुओं का मनोबल बढायेगा जिन्होंने पुलिस महकमे को रंडी के कोठे से भी बदतर बनाने का गुनाह किया है। सि‍ंह जैसे लोग ही इस सडी-गली व्यवस्था को बदल सकते हैं। महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री और गृहमंत्री यदि प्रदेश के पुलिस विभाग में ऊपर से नीचे तक बदलाव लाना चाहते हैं तो उन्हें इस अफसर के दर्द को समझने, में जरा भी देरी नहीं करनी चाहिए।' पर यहां पर सुधार लाने और किसी की पीडा को जानने की किसे पडी है। शासकों से तो ऐसी उम्मीद करना ही बेकार है। नौकरी छोडने के बाद योगेश प्रताप ने निष्क्रियता का चोला नहीं ओडा। आम आदमी की लडाई लडाने के लिए वे वकालत के मैदान में कूद पडे। उन्होंने मुम्बई हाई कोर्ट में प्रेक्टिस करते हुए आम नागरिकों के हित के लिए लगातार याचिकाएं दाखिल करते हुए वो नाम और सम्मान कमाया है जो पुलिस में रहकर तो कतई संभव नहीं था। उनकी याचिकाओं पर हुए फैसलों के चलते कई बार महाराष्ट्र सरकार को अपने फैसले बदलने पर विवश होना पडा है। हां उनसे मुम्बई के बिल्डर, भूमाफिया और अराजकतत्व खासे खफा रहते हैं। पर उन्हें कल की तरह आज भी किसी की परवाह नहीं है। वे इन दिनों एक फिल्म भी बना रहे हैं। जिसमें वही दिखाने जा रहे हैं जो उन्होंने पुलिस की नौकरी के दौरान देखा, भोगा और जाना। फिल्म में एक दृश्य में एक नये आईपीएस अफसर को एक हवलदार की ईमानदारी से प्रभावित होकर कभी भी रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार न करने की प्रतिज्ञा लेते हुए दिखाया गया है। वहीं दूसरी और एक भ्रष्ट और चाटूकार कमिश्नर को अपना कार्यकाल बढवाने के लिए गृहमंत्री के चरणों में गिडगिडाते हुए दिखाने के साथ-साथ एक मंत्री के माफियाओं के साथ करीबी रिश्तों का भी फिल्म में खुलकर खुलासा किया गया है। यह मंत्री महोदय वर्तमान में भी महाराष्ट्र सरकार में शामिल हैं। तय है कि इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए बडी ताकतें जोर लगायेंगी। पर योगेश प्रताप सि‍ंह ऐसी-वैसी मिट्टी के नहीं बने हैं कि हार मान लें और चुपचाप बैठ जाएं...। हां योगेश प्रताप सि‍ंह जो फिल्म बना रहे हैं उसका नाम है 'यही सच है...।'

Thursday, June 24, 2010

भाजपा तो है थैलीशाहों की पार्टी

जब से संघ की पसंद नितिन गडकरी ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कुर्सी पायी है तभी से पार्टी की इमारत धसकती-सी दिखायी देने लगी है। इस डगमगाती इमारत पर कई नेता अपना-अपना डंडा लेकर खडे हैं। डंडे में झंडा कहीं नजर नहीं आ रहा है। नितिन गडकरी भले ही यह कहते नहीं थक रहे हों कि भारतीय जनता पार्टी काम करने वालों की कदर करना जानती है और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वे स्वयं हैं जो कभी दिवारों पर पोस्टर चिपकाया करते थे और आज पार्टी के अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं। अध्यक्ष महोदय सच कहते हैं या झूठ यह भी खोज और शोध का विषय है।जिन्होंने भाजपा को बहुत करीब से देखा और जाना है उनका निष्कर्ष तो यही बताता है कि यह पार्टी रईसों की पार्टी है। इसमें सौदागरों की भरमार है। खाली जेब वालों की यहां कोई पूछ-परख नहीं होती। वैसे तो देश की लगभग हर राजनीतिक पार्टी का यह उसूल बन चुका है कि विधान परिषद और राज्यसभा में धन्नासेठों को ही पहुंचाओ और फटेहालों को दिलासा देकर मुंह ताकते रहने के लिए छोड दो। पर भाजपा तो इस मामले में सबको मात देती चली आ रही है। एडवोकेट राम जेठमलानी का नाम तो आपने जरूर सुना ही होगा। यह महाशय देश के बडे नामी वकील कहलाते हैं। सिर्फ रईसों के ही केस लडते हैं। गरीब इन तक पहुंचने की सोच ही नहीं सकते, क्योंकि इनकी कोर्ट में एक बार खडे होने की फीस ही पंद्रह से पच्चीस लाख रुपये तक है। जाहिर है कि बहुत मालदार हैं वकील साहब...। भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना इन पर हमेशा मेहरबान रही है। हद दर्जे के मतलब परस्त जेठमलानी जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने से भी नहीं चूकते। जब देश में राजग की सरकार थी और संत पुरुष श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब जेठमलानी को केंद्रीय मंत्री बनाया गया था। मंत्री पद पर रहते हुए इस शख्स ने ऐसी-ऐसी नौटंकियां कीं कि आखिरकार मंत्री की कुर्सी छिन गयी। तब जेठमलानी की बौखलाहट देखने लायक थी। अटल जी से खुन्नस खा चुके जेठमलानी ने बाद में अटल जी के खिलाफ लोकसभा चुनाव भी लडा और मुंह की खायी। रईस अपराधियों और देश के गद्दारों तक की पैरवी करने वाले जेठमलानी हद दर्जे के असभ्य अहंकारी और बदतमीज भी हैं। पता नहीं भाजपा की कौन-सी कमजोर नस उनकी मुट्ठी में है कि 'थाली छेदक' को दुत्कार के बदले उपहार ही मिलता चला आ रहा है। बताते हैं अटल जी से जबर्दस्त वैमनस्य रखने वाले जेठमलानी का भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी से गजब का याराना है जिसके चलते भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष गडकरी जेठमलानी को राज्यसभा की सदस्यता से नवाजने के लिए मजबूर हो गये। अस्सी वर्ष से ऊपर के हो चुके भाजपा के इस नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य ने मीडिया की तौहीन करके दिखा दिया है कि इनकी सनक मिजाजी और हेकडी जस की तस है। राम जाने यह शख्स राज्यसभा में कैसे-कैसे गुल खिलायेगा...। इस हकीकत से तो हर कोई वाकिफ है कि अपने यहां के न्यूज चैनल वालों को विवादास्पद चेहरों का साक्षात्कार लेना और दिखाना कुछ ज्यादा ही सुहाता है। इसी परिपाटी का पालन करते हुए स्टार न्यूज चैनल के दीपक चौरसिया जेठमलानी के राज्य सभा सांसद निर्वाचित होते ही साक्षात्कार लेने के लिए उनके निवास स्थान पर जा पहुंचे। जेठमलानी को गदगद होना चाहिए था कि मीडिया उनके जैसे सत्ता खोरों को खास तवज्जो देता है। पर ऐसा हुआ नहीं...।पत्रकार दीपक चौरसिया ने साक्षात्कार के दौरान जेठमलानी के अतीत और वर्तमान को लेकर कुछ ऐसे सवाल दाग दिये कि वे आग बबूला हो गये। उन्हें लगा कि यह पत्रकार किसी दुश्मन का भेजा हुआ कोई ऐसा दलाल है जो उनके मुखौटे को नोच डालना चाहता है। बडे-बडे गुंडे-बदमाशों और अपराधियों को अपने तर्कों के दम पर बरी करवा चुके वकील को सच की सुई ने इस कदर आहत कर दिया कि वे आपे से बाहर होकर अशिष्ट भाषा पर उतर आये- ''तुम सब मीडिया वाले असभ्य और जाहिल हो। जहां-तहां बिछ और बिक जाते हो। कांग्रेस के तो तुम जरखरीद गुलाम हो। इसलिए तुम जैसों को तो मैं देखना भी पसंद नहीं करता... तुम्हारी भलाई इसी में है कि फौरन मेरे घर से बाहर हो जाओ। नहीं तो...!''जेठमलानी की दुत्कार सुनने के बाद पत्रकार दीपक चौरसिया मुंह लटका कर बदतमीज सांसद के घर से बाहर निकल गये। परंतु जिन लाखों सजग लोगों ने पूरे तमाशे का जीता जागता चित्रण टेलीविजन पर देखा वे तो जेठमलानी और भाजपा को जी भरकर कोसते रह गये। पत्रकार दीपक चौरसिया का अहंकारी और सनकी सासंद के समक्ष चुप्पी साधे रहना किसी भी मीडिया प्रेमी को रास नहीं आया। लगता है वे अपने न्यूज चैनल पर जो तमाशा दिखाना चाहते थे उसे उन्होंने बेइज्जत होकर फिल्माया भी और दिखाया भी। यही उनका असली मकसद था। अधिकांश न्यूज चैनल वाले आजकल ऐसे ही पत्रकारिता कर रहे हैं। वाहियात नेता के समक्ष नामी-गिरामी पत्रकार की चुप्पी के भला और क्या मायने हो सकते हैं? क्या यह भी मान लिया जाए कि पत्रकार बंधु किन्हीं मजबूरियों के वशीभूत होकर अपनी खुद्दारी भी गिरवी रखते चले जा रहे हैं? भारतीय जनता पार्टी को जेठमलानी जैसे 'चेहरे' मुबारक हों। बेचारी की समझ में अब यह बात तो आने से रही कि किनकी वजह से उसके पांव के नीचे जमीन लगातार दरकती ही जा रही है...। जेठमलानी जैसे खरबपतियों को कुर्सियां बांटने वाली पार्टी के अध्यक्ष से कोई यह भी तो पूछे कि जनाब अगर आपकी पार्टी में पोस्टर लगाने वालों को तरजीह दी जाती है तो फिर जेठमलानी जैसे धनपतियों का भाजपा में वर्चस्व क्यों है? लोगों की यह धारणा कहां पर गलत है कि भाजपा थैलीशाहों का जमावडा है। इसके आगे और पीछे सिर्फ और सिर्फ थैलीशाह ही खडे हैं। अभी हाल में बिहार में मोदी के विज्ञापनों के प्रकाशन को लेकर जो हंगामा हुआ उसके पीछे का सच भी जान लीजिए। बिहार की राजधानी पटना में मोदी को प्रचारित करने वाले तमाम विज्ञापन सूरत के एक भाजपा सांसद के जरिए छपवाये गये थे। गुजरात में हुए सहकारी बैंक घोटाले के खलनायक रहे इस सांसद ने गुजरात के हीरा व्यापारियों से मोटी उगाही कर इन विज्ञापनों के बिल का भुगतान किया१ वैसे भी टाटा-बिडला और तमाम अंबानियों की जमात नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाये जाने की चाह व्यक्त करती रही है। इसी से समझा और जाना जा सकता है कि भाजपा को कितने...कितने पावरफुल धनबलियों का साथ मिलता चला आ रहा है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जैसों के शोर मचाने से क्या फर्क पडता है...

भाजपा तो है थैलीशाहों की पार्टी

जब से संघ की पसंद नितिन गडकरी ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कुर्सी पायी है तभी से पार्टी की इमारत धसकती-सी दिखायी देने लगी है। इस डगमगाती इमारत पर कई नेता अपना-अपना डंडा लेकर खडे हैं। डंडे में झंडा कहीं नजर नहीं आ रहा है। नितिन गडकरी भले ही यह कहते नहीं थक रहे हों कि भारतीय जनता पार्टी काम करने वालों की कदर करना जानती है और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वे स्वयं हैं जो कभी दिवारों पर पोस्टर चिपकाया करते थे और आज पार्टी के अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं। अध्यक्ष महोदय सच कहते हैं या झूठ यह भी खोज और शोध का विषय है।जिन्होंने भाजपा को बहुत करीब से देखा और जाना है उनका निष्कर्ष तो यही बताता है कि यह पार्टी रईसों की पार्टी है। इसमें सौदागरों की भरमार है। खाली जेब वालों की यहां कोई पूछ-परख नहीं होती। वैसे तो देश की लगभग हर राजनीतिक पार्टी का यह उसूल बन चुका है कि विधान परिषद और राज्यसभा में धन्नासेठों को ही पहुंचाओ और फटेहालों को दिलासा देकर मुंह ताकते रहने के लिए छोड दो। पर भाजपा तो इस मामले में सबको मात देती चली आ रही है। एडवोकेट राम जेठमलानी का नाम तो आपने जरूर सुना ही होगा। यह महाशय देश के बडे नामी वकील कहलाते हैं। सिर्फ रईसों के ही केस लडते हैं। गरीब इन तक पहुंचने की सोच ही नहीं सकते, क्योंकि इनकी कोर्ट में एक बार खडे होने की फीस ही पंद्रह से पच्चीस लाख रुपये तक है। जाहिर है कि बहुत मालदार हैं वकील साहब...। भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना इन पर हमेशा मेहरबान रही है। हद दर्जे के मतलब परस्त जेठमलानी जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने से भी नहीं चूकते। जब देश में राजग की सरकार थी और संत पुरुष श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब जेठमलानी को केंद्रीय मंत्री बनाया गया था। मंत्री पद पर रहते हुए इस शख्स ने ऐसी-ऐसी नौटंकियां कीं कि आखिरकार मंत्री की कुर्सी छिन गयी। तब जेठमलानी की बौखलाहट देखने लायक थी। अटल जी से खुन्नस खा चुके जेठमलानी ने बाद में अटल जी के खिलाफ लोकसभा चुनाव भी लडा और मुंह की खायी। रईस अपराधियों और देश के गद्दारों तक की पैरवी करने वाले जेठमलानी हद दर्जे के असभ्य अहंकारी और बदतमीज भी हैं। पता नहीं भाजपा की कौन-सी कमजोर नस उनकी मुट्ठी में है कि 'थाली छेदक' को दुत्कार के बदले उपहार ही मिलता चला आ रहा है। बताते हैं अटल जी से जबर्दस्त वैमनस्य रखने वाले जेठमलानी का भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी से गजब का याराना है जिसके चलते भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष गडकरी जेठमलानी को राज्यसभा की सदस्यता से नवाजने के लिए मजबूर हो गये। अस्सी वर्ष से ऊपर के हो चुके भाजपा के इस नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य ने मीडिया की तौहीन करके दिखा दिया है कि इनकी सनक मिजाजी और हेकडी जस की तस है। राम जाने यह शख्स राज्यसभा में कैसे-कैसे गुल खिलायेगा...। इस हकीकत से तो हर कोई वाकिफ है कि अपने यहां के न्यूज चैनल वालों को विवादास्पद चेहरों का साक्षात्कार लेना और दिखाना कुछ ज्यादा ही सुहाता है। इसी परिपाटी का पालन करते हुए स्टार न्यूज चैनल के दीपक चौरसिया जेठमलानी के राज्य सभा सांसद निर्वाचित होते ही साक्षात्कार लेने के लिए उनके निवास स्थान पर जा पहुंचे। जेठमलानी को गदगद होना चाहिए था कि मीडिया उनके जैसे सत्ता खोरों को खास तवज्जो देता है। पर ऐसा हुआ नहीं...।पत्रकार दीपक चौरसिया ने साक्षात्कार के दौरान जेठमलानी के अतीत और वर्तमान को लेकर कुछ ऐसे सवाल दाग दिये कि वे आग बबूला हो गये। उन्हें लगा कि यह पत्रकार किसी दुश्मन का भेजा हुआ कोई ऐसा दलाल है जो उनके मुखौटे को नोच डालना चाहता है। बडे-बडे गुंडे-बदमाशों और अपराधियों को अपने तर्कों के दम पर बरी करवा चुके वकील को सच की सुई ने इस कदर आहत कर दिया कि वे आपे से बाहर होकर अशिष्ट भाषा पर उतर आये- ''तुम सब मीडिया वाले असभ्य और जाहिल हो। जहां-तहां बिछ और बिक जाते हो। कांग्रेस के तो तुम जरखरीद गुलाम हो। इसलिए तुम जैसों को तो मैं देखना भी पसंद नहीं करता... तुम्हारी भलाई इसी में है कि फौरन मेरे घर से बाहर हो जाओ। नहीं तो...!''जेठमलानी की दुत्कार सुनने के बाद पत्रकार दीपक चौरसिया मुंह लटका कर बदतमीज सांसद के घर से बाहर निकल गये। परंतु जिन लाखों सजग लोगों ने पूरे तमाशे का जीता जागता चित्रण टेलीविजन पर देखा वे तो जेठमलानी और भाजपा को जी भरकर कोसते रह गये। पत्रकार दीपक चौरसिया का अहंकारी और सनकी सासंद के समक्ष चुप्पी साधे रहना किसी भी मीडिया प्रेमी को रास नहीं आया। लगता है वे अपने न्यूज चैनल पर जो तमाशा दिखाना चाहते थे उसे उन्होंने बेइज्जत होकर फिल्माया भी और दिखाया भी। यही उनका असली मकसद था। अधिकांश न्यूज चैनल वाले आजकल ऐसे ही पत्रकारिता कर रहे हैं। वाहियात नेता के समक्ष नामी-गिरामी पत्रकार की चुप्पी के भला और क्या मायने हो सकते हैं? क्या यह भी मान लिया जाए कि पत्रकार बंधु किन्हीं मजबूरियों के वशीभूत होकर अपनी खुद्दारी भी गिरवी रखते चले जा रहे हैं? भारतीय जनता पार्टी को जेठमलानी जैसे 'चेहरे' मुबारक हों। बेचारी की समझ में अब यह बात तो आने से रही कि किनकी वजह से उसके पांव के नीचे जमीन लगातार दरकती ही जा रही है...। जेठमलानी जैसे खरबपतियों को कुर्सियां बांटने वाली पार्टी के अध्यक्ष से कोई यह भी तो पूछे कि जनाब अगर आपकी पार्टी में पोस्टर लगाने वालों को तरजीह दी जाती है तो फिर जेठमलानी जैसे धनपतियों का भाजपा में वर्चस्व क्यों है? लोगों की यह धारणा कहां पर गलत है कि भाजपा थैलीशाहों का जमावडा है। इसके आगे और पीछे सिर्फ और सिर्फ थैलीशाह ही खडे हैं। अभी हाल में बिहार में मोदी के विज्ञापनों के प्रकाशन को लेकर जो हंगामा हुआ उसके पीछे का सच भी जान लीजिए। बिहार की राजधानी पटना में मोदी को प्रचारित करने वाले तमाम विज्ञापन सूरत के एक भाजपा सांसद के जरिए छपवाये गये थे। गुजरात में हुए सहकारी बैंक घोटाले के खलनायक रहे इस सांसद ने गुजरात के हीरा व्यापारियों से मोटी उगाही कर इन विज्ञापनों के बिल का भुगतान किया१ वैसे भी टाटा-बिडला और तमाम अंबानियों की जमात नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाये जाने की चाह व्यक्त करती रही है। इसी से समझा और जाना जा सकता है कि भाजपा को कितने...कितने पावरफुल धनबलियों का साथ मिलता चला आ रहा है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जैसों के शोर मचाने से क्या फर्क पडता है...

Thursday, June 17, 2010

मुसलमान कब तक होते रहेंगेराजनेताओं के छल-कपट के शिकार?

धिक्कार है उन राजनेताओं पर जो रंग दर रंग बदलते हुए गिरगिट को भी शर्मिंदा कर रहे हैं। लानत है उन पर जो अपने ही देशवासियों के साथ छल-कपट करने में कतई नहीं कतराते। उन पर भी लानत है जिनके लिए इस देश के मुसलमान सिर्फ और सिर्फ वोटर भर हैं। देश की राजनीति के प्रख्यात-कुख्यात दलाल अमर ि‍संह को इन दिनों मुसलमानों की बहुत चिन्ता सता रही है। हाल ही में उनका बयान आया है कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा मुसलमानों को बेवकूफ बनाया है और येन-केन-प्रकारेण उनके वोट हथियाने के मकसद को पूरा किया है। यह वही अमर सि‍ंह हैं जो चौदह वर्षों तक समाजवादी पार्टी में रह चुके हैं और पार्टी सुप्रीमो मुलायम qसह के हर फैसले में शामिल हुआ करते थे। पार्टी से धकियाये जाने के बाद अब उन्हें मुसलमानों के साथ होते चले आ रहे भेदभाव और अवहेलना की चि‍ंता इस कदर सताने लगी है कि मंचों पर भाषण देते-देते रुआंसे हो जाते हैं। उन्होंने अभी कोई राजनीतिक पार्टी तो नहीं बनायी, पर एक ‘मंच‘ (लोकमंच) जरूर बना लिया है जिसकी छाती पर सवार होकर किसी को कोसने और किसी को चूमने-चाटने का नाटक करते रहते हैं। राजनीति में बुरी तरह से पिटने के बाद फिल्मों में लटके-झटके दिखाने में लगे अमर सि‍ंह ने ऐलान किया है कि आगामी विधान सभा चुनाव जीतने के बाद उनका मंच किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बना कर ही दम लेगा। अमर सि‍ंह की तरह और भी बहुतेरे नेता हैं जो मुसलमानों को रिझाने और लुभाने के लिए शाब्दिक चारा फेंकते रहते हैं। अन्दर से भले ही मुसलमानों के प्रति कैसी भी सोच रखते हों पर ऊपर से सभी मुसलमानों के शुभqचतक दिखना चाहते हैं।बीते सप्ताह बिहार में गजब का नजारा देखने में आया। एक असली फोटो ने दंगल-सी हालत पैदा कर दी। बिहार में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल युनाईटेड मिल-जुलकर सरकार चला रहे हैं। तय है कि दोनों पार्टियों ने एकजुट होकर विधान सभा चुनाव लडा था और लालू प्रसाद यादव का पत्ता साफ करने में सफलता पायी थी। दोनों पार्टियों के नेता एक-दूसरे के अहसानमंद थे। नीतीश कुमार सफलता पूर्वक साढे चार साल से मुख्यमंत्री पद की कमान संभाले चले आ रहे हैं और कहीं न कहीं उनके मन में यह बात बैठ गयी है कि उन्होंने बिहार के लिए इतना कुछ कर दिया है कि लोग अब सिर्फ उनको देखकर ही सिर पर खडा अगला विधान सभा चुनाव जितवा देंगे। दूसरी तरफ भाजपा वालों ने भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। भाजपा के थके-हारे नेता लालकृष्ण आडवाणी भले ही बिहार का अगला विधान सभा चुनाव जनता दल इस युनाईटेड के साथ लडने की मंशा रखते हों पर नये भाजपा कप्तान नितिन गडकरी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी कोई अलग-सी खिच‹डी पकाने के फेर में हैं। भाजपा के तेजतर्रार नेता नरेंद्र मोदी अपने किस्म की राजनीति करने में विश्वास रखते हैं। बीते सप्ताह उन्होंने बिहार की जमीन पर पैर रखने से पहले बिहार के अखबारों में ऐसे विज्ञापन प्रकाशित करवा दिये कि नीतीश के तन-बदन में आग लग गयी। उस पुरानी फोटो ने उन्हें आगबबूला कर दिया जिसमें वे और नरेंद्र मोदी एक दूसरे का हाथ थामे विजयी मुद्रा में मुस्करा रहे थे। यह फोटो फर्जी नहीं असली थी। पर नीतीश कुमार के तो होश ही उ‹ड गये। उन्हें लगा कि भाजपा वाले उनके मुस्लिम वोटों पर डाका डालने की साजिश को अंजाम देने की फिराक में हैं। बिहार के मुस्लिम मतदाता दो यारों की लुभावनी फोटो को देखकर बहक न जाएं इसलिए नीतीश कुमार ने हंगामा ख‹डा कर दिया। गुजरात के नरेंद्र मोदी की यह मजाल कि वे बिहार में आकर तमाम अखबारों में ऐसी तस्वीर और ऐसी तकदीर छपवा दें जिससे उनके वोट बैंक पर नकारात्मक असर प‹डे और मुसलमान भाई बिचक जाएं। सवाल यह उठता है कि अगर नीतीश कुमार की निगाह में मोदी इतने साम्प्रदायिक हैं तो उन्होंने चहकते हुए मोदी के हाथ को अपने हाथ में लेकर वो फोटो क्या सोच कर qखचवायी थी? नीतिश कुमार के पास इतना बडा झूठ बोलने की गुंजाइश भी नहीं है कि वे कह सकें कि यह फोटो गोधरा कांड के पहले qखचवायी गयी थी। तय है नीतीश जब यह पोज दे रहे थे तब भी मोदी वही थे जो आज हैं। पर नीतीश बदल गये हैं। उन्हें बिहार के सोलह प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के हाथ से निकल जाने का भय सताने लगा है। नरेंद्र मोदी के छपवाये गये विज्ञापन में यह भी कहा गया कि संकट की घडी में गुजरात ही था जिसने बिहार की सर्वाधिक सहायता की। नीतीश इस सच्चाई को भी नहीं झेल पाये। उन्हें लगा कि उनके दोनों गालों को थप्पडों से लाल कर दिया गया है। नरेंद्र मोदी कोई साधु-संत तो हैं नहीं कि अवसर का फायदा न उठायें। उन्होंने वही किया जो अभी तक दूसरे शातिर नेता करते चले आ रहे हैं।यह मुसलमानों का दुर्भाग्य है कि उन्हें इस देश की हर पार्टी ने अपने मकसद के लिए ही इस्तेमाल किया है। यह भी मुसलमानों की बदनसीबी ही है कि इस देश में ऐसे ‘दलङ्क भी हैं जिनकी निगाह में अधिकांश मुसलमान गद्दार हैं। खाते हि‍ंदुस्तान की हैं और गाते पाकिस्तान की हैं। भारतीय मुसलमानों की छवि को बिगा‹डने में नेताओं का बहुत बडा हाथ है। मीडिया, लेखकों और चि‍ंतकों के एक वर्ग ने मुसलमानों की अनेक मनगढंत छवियां बनाने और पेश करने में कोई कसर नहीं छोडी। हि‍ंदुस्तान के एक जाने-माने पत्रकार और लेखक तो यह मानते हैं कि आम मुसलमानों का तबका आठ-दस बच्चे पैदा करने में विश्वास रखता है। परिवार नियोजन से उसका कोई लेना-देना नहीं है। इनके बच्चे गली-कूचों की गंदगी में खेलते रहते हैं और यह लोग अंधेरी, बदबूदार गंदी बस्तियों में इतने रम गये हैं कि उनसे बाहर निकलने के लिए हाथ-पैर मारना नहीं चाहते। देश के अधिकांश मुसलमान अपनी औरतों और बच्चियों को आज भी आधुनिकता के उजाले और शिक्षा से दूर रखना चाहते हैं। अपने आपको कुछ ज्यादा जानकार समझने वालों का यह भी कहना है कि मुसलमान धर्म के आधार पर मतदान करते हैं और उनकी यही कोशिश रहती है कि उनका वोट मुस्लिम प्रत्याशी को ही जाए।भारतीय मुसलमानों के बारे में और भी कई ऐसी ऊटपटांग बातें समय-समय पर प्रचारित होती रहती हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। असली सच तो यह है कि अपने देश में कुछ राह भटके मुसलमानों के कारण पूरे मुसलमानों की शक की निगाह से देखने वालों की कमी नहीं है। नरेंद्र मोदी जैसे नेता इन्हीं ‘शकीङ्क लोगों के नायक हैं। यह हकीकत है कि आप अगर किसी को शक की निगाह से देखेंगे तो वह भी आप पर विश्वास करने से कतराने लगेगा। आजादी के ६३ साल बाद भी मुसलमानों का बहुत ब‹डा वर्ग एक अजीब कश्मकश के दौर से गुजर रहा है। उनमें एकजुटता का घोर अभाव है। किसी भी दल के नेता ने कभी भी मुस्लिमों के हालात सुधारने के प्रयास नहीं किये। मुसलमानों के पास अपना ऐसा कोई मुस्लिम नेता नहीं है जो वाकई ईमानदार हो। अगर मुस्लिम नेता नेकनीयत के साथ अपने समुदाय का नेतृत्व करते तो कोई भी तथाकथित विद्वान मुसलमानों की तरह-तरह की छवियां ग‹ढने की जुर्रत नहीं कर पाता। न ही ‘दलालों‘ को मुसलमानों की झूठी तरफदारी करने का कोई मौका मिलता।

Thursday, June 3, 2010

शरणार्थियों की बस्ती

कुछ खबरें सोचने के लिए मजबूर कर ही देती हैं। आप लाख चाहें पर उन्हें नजर अंदाज नहीं कर सकते। उल्हासनगर की इस खबर को ही लीजिए जिसे प‹ढते ही मैं खुद को कलम चलाने से रोक नहीं पाया। मुंबई के निकट स्थित उल्हासनगर में तीन हजार से अधिक पत्रकार हैं! इनमें से अधिकांश पत्रकारों का एक सूत्रीय लक्ष्य हफ्ता वसूली का है। अधिकांश पत्रकार ऐसे हैं जो दिन भर अपने शिकार की खोज में लगे रहते हैं। जनजीवन से जुडी आम खबरों से उनका कोई वास्ता नहीं है। अपने वाहनों पर पत्रकार लिखकर घूमते ये शिकारी हमेशा इस बात की जानकारी लेने के लिए दौड-भाग करते रहते हैं कि शहर में कहां-कहां अवैध धंधे चल रहे हैं, अतिक्रमण हो रहे हैं और कौन-सी योजना के लिए कितना सरकारी फंड स्वीकृत हुआ है या फिर होने जा रहा है। अराजक तत्वों को आश्रय देना और उनसे हफ्ता वसूल करना इनका पेशा बन चुका है। महानगर पालिका, पीडब्ल्यूडी, सि‍चाई विभाग, आबकारी विभाग और पुलिस वालों से भी इन्हें नियमित देन मिलती रहती है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो किसी अखबार या न्यूज चैनल से नहीं जुडे हुए हैं फिर भी बडी ठसन के साथ खुद को पत्रकार बताते हुए अपना कामधंधा कर रहे हैं। इनकी आलीशान कारों पर पत्रकार का स्टीकर लगा देख बडी-बडी हस्तियां भी इन्हें सलाम करती हैं और झुक कर पेश आती हैं। शहर की हर धडकन से वाकिफ कुछ सज्जनों का कहना है कि उल्हासनगर में जब से अवैध निर्माणों और अवैध धंधों की बाढ आयी है तभी से गली-गली में पत्रकार और अखबार निकालने वाले पैदा हो गये हैं। छुटभइये किस्म के नेताओं बिल्डरों और शराब माफियाओं ने भी अखबारों का प्रकाशन शुरू कर दिया है और वे बडे फख्र के साथ संपादक और अखबार मालिक कहलाते फिरते हैं। यहां पर अखबार चलने और बिकने से तो रहे फिर भी अखबारों की संख्या बढती ही चली जा रही है। स्थानीय लोगों में इस बात की चर्चा है कि उल्हासनगर में हजार-दो हजार रुपये में प्रेस का कार्ड आसानी से मिल जाता है। जो प्रेस कार्ड खरीद लेता है वही पत्रकार बन जाता है और शिकार फांसने में लग जाता है। नकली सामान बनाने और फिर उसे पूरे देश में खपाने के लिए उल्हासनगर को जो कुख्याति हासिल हो चुकी है उसमें निरंतर इजाफा करने में लगे हैं कुकरमुत्तों की तरह उगते और फैलते ये पत्रकार। उल्हासनगर और उससे एकदम सटे कल्याण में से उन सि‍ंधियों का वर्चस्व है जो देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से यहां आये और बसाये गये थे। दाऊद और अरुण गवली की तर्ज पर आपराधिक गतिविधियां चलाने और देखते ही देखते अरबों-खरबों का साम्राज्य खडा करने वाले पप्पू कालानी जैसे लोग यहां की राजनीति में भी छाये हुए हैं। पप्पू कालानी मर्द मराठा शरद पवार की मेहरबानी से विधायक बनने का आनंद भी भोग चुके हैं। पप्पू की धर्म पत्नी ज्योति कालानी भी राजनीति तथा समाज सेवा के क्षेत्र में पति के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलती हैं। सत्ता और धन के बल पर पप्पू और ज्योति वो सारे गलत काम करते चले आ रहे हैं जिन्हें अवैध और अनैतिक माना जाता है। उल्हासनगर में ऐसे-ऐसे धनबलि और बाहुबलि हैं जो रातोंरात किसी का भी काम तमाम कर सकते हैं। प्रापर्टी और होटल व्यवसाय में लगभग इन्हीं की तूती बोलती है। मुंबई की तर्ज पर यहां के बीयर बारों और होटलों में जमकर देह व्यापार होता है जिसकी पुख्ता जानकारी पुलिस को भी रहती है और राजनेताओं को भी। पत्रकारों की तरह वे भी आंख, कान और मुंह बंद कर अपना काम करते रहते हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उल्हासनगर एक ऐसा टापू है जहां नेताओं, समाज सेवकों, गुंडे बदमाशों, पत्रकारों और पुलिस वालों के बीच ऐसा जबरदस्त गठजोड हो चुका है कि सारे मामले आपस में मिल बैठकर सुलझा और निपटा लिये जाते हैं। शाम होते ही कई पत्रकार आबकारी विभाग और पुलिस वालों के साथ दारू पीते देखे जा सकते हैं। मनपा के अधिकारियों का भी कई पत्रकारों से अटूट याराना है। दरअसल पत्रकार खबरी की भूमिका भी बखूब निभाते हैं। इसलिए हर किसी के काम आते हैं। पुलिस वालों को अवैध धंधो और धंधेबाजों की सूचना देकर अपना हिस्सा पाने वाले पत्रकारों का रूतबा भी देखते बनता है। खून-पसीना बहाने से परहेज करने वाले बेरोजगार नये-नवेले छोकरे भी इनसे प्रभावित हो रहे हैं। वे इन्हें अपना आदर्श मानते हुए इनके आगे-पीछे घूमते देखे जा सकते हैं। तय है कि शरणार्थियों की बस्ती का भविष्य बहुत उज्जवल है।

Thursday, May 27, 2010

इनकी दादागिरी और बेशर्मी तो देखो

बडी मुश्किल है। अपने देश में हल्ला-गुल्ला तो बहुत होता है पर हल नहीं निकल पाता। दरअसल हल निकलने ही नहीं दिया जाता। मुद्दे को लटकाये रखने के पीछे कइयों का स्वार्थ और भलाई छिपी होती है। दूसरों को बेनकाब करने वाले अपने चेहरे के मुखौटे को किसी भी हालत में उतरने नहीं देना चाहते। पिछले साल देश में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में मीडिया के बिकाऊ हो जाने के तौरतरीकों को लेकर जमकर शोर शराबा हुआ। देश के नामी-गिरामी दैनिक अखबारों पर खबरें बेचने के आरोप लगाये गये। दैनिक भास्कर, हरिभूमि, अमर उजाला, दैनिक जागरण जैसे अखबारों के बारे में यह खबरें आयीं कि ये अखबार खबरों का धंधा करते हैं। चुनावी खबरों को धन लेकर छापते हैं। जो प्रत्याशी धन नहीं देता उसकी छवि को मटियामेट करने में भी देरी नहीं लगाते। भारतीय जनता पार्टी की तेज तर्रार नेत्री सुषमा स्वराज, बहुजन पार्टी के हरिमोहन धवन, समाजवादी पार्टी के मोहन ि‍संह जैसे कई नाम थे जो अखबारों के इस गोरखधंधे के शिकारों में शामिल थे। भाजपा के ही लालजी टंडन ने तो दैनिक जागरण का नाम लेते हुए स्पष्ट किया था कि इस अखबार के मालिकों ने उनसे लाखों रुपये की मांग की है। सुषमा स्वराज ने अखबार का नाम तो नहीं लिया था पर यह जरूर बताया कि उनके पक्ष में न्यूज छापने के लिए एक करो‹ड रुपये एक अखबार वाले ने मांगे थे। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चोटाला भी धन लेकर खबर छापने वाले अखबार मालिकों से तंग आकर प्रेस परिषद को अपना दुख‹डा सुनाने से नहीं चूके थे। देश के कुछ संपादकों और पत्रकारों ने पेड न्यूज के खिलाफ जबरदस्त अभियान भी चलाया। स्वर्गीय प्रभाष जोशी जैसे निर्भीक कलमवीरों की बुलंद आवाज ने अपना असर दिखाया और देश की प्रेस परिषद ने दूध का दूध और पानी का पानी करने की कोशिश भी की और कदम भी ब‹ढाये पर अंतत: वही हुआ जो अभी तक होता आया है...।प्रेस परिषद ने सचाई की तह में जाकर जो रिपोर्ट तैयार की उसे मीडिया के धनपशुओं ने सामने आने ही नहीं दिया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया के धनबलियों को यह बात रास नहीं आयी कि वे बेपर्दा हों। पढे-लिखे संपादकों और पत्रकारों को अपने इशारों पर नचाने वाले धनासेठ अखबार मालिक अपने पक्ष में रिपोर्ट चाहते थे। बबूल का पे‹ड बोने के बाद आम की चाह अखबारी जगत के उस चेहरे को उजागर कर गयी जिसने बेहद मायावी भ्रमजाल बुन रखा है। इस मायावी भ्रमजाल को बुनने में अकेले मीडिया के महारथियों के हाथ ही नहीं रंगे हुए हैं। दरअसल लोकतंत्र में कोई भी अकेला अपने बलबूते पर मनमाने तरीके से किसी की खाल नहीं नोच सकता। यह देश राजनेताओं के हिसाब से चलता चला आ रहा है। नेता देने वाले हैं और अखबार वाले लेने वाले। कोई भी लेन-देन आपसी रजामंदी पर टिका होता है। लेन-देन में जब ग‹डब‹डी और वादा खिलाफी होती हे तो बात बिग‹ड ही जाया करती है। लोकसभा के चुनाव हों या विधानसभाओं के पिछले कुछ वर्षों से निरंतर अखबारों और नेताओं का गठजो‹ड खबरों में छाया रहा है। आंध्रप्रदेश में लोकसत्ता पार्टी के एक प्रत्याशी ने प्रेस परिषद के समक्ष अपना रोना रोते हुए कहा कि तेलगू अखबार इनाडु ने उनके पक्ष में खबर छापने के लिए एक लाख रुपये की मांग की थी पर उन्होंने पचास हजार में सौदा पटाकर अपना काम निकलवाया। यह महाशय रिश्वत देने का संगीन अपराध कर यकीनन सस्ते में छूट गये।महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और बिहार में तो लोकसभा का चुनाव ल‹डने वालों को करो‹डों से हाथ धोना प‹डा। फिर भी कइयो के हिस्से में पराजय आयी। जो जीत गये उन्होंने मीडिया का भी अहसान माना। वैसे भी लोकसभा चुनाव वही दिग्गज ल‹डते हैं जिनमें करो‹डों रुपये फूंकने का दम होता है। उन्हें यह भी पता होता है कि मतदाताओं को रिझाने के लिए दारु, सा‹डी, कंबल, दरी-चादर के साथ अखबार वालों की भी सेवा करनी प‹डती है। चूंकि वर्तमान में देश के अधिकांश अखबार ऐसे ब‹डे-ब‹डे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के द्वारा चलाये जा रहे हैं जिन्हें जितना मिले कम है। इनके लिए हर चुनाव ईद और दिवाली होता है। बैठे-बिठाये करो‹डों के वारे न्यारे हो जाते हैं। तय है कि यह सारा खेल उनकी बदौलत होता हे जिन्हें हम और आप नेता और राजनेता कहते हैं। इनमें से बहुतेरे तो पुराने खिला‹डी होते हैं। जिन्हें कोई भी चुनाव जीतने में महारत हासिल होती है। इनके पास गुंडे बदमाशों की भी‹ड के साथ-साथ पत्रकारों की वो जमात भी होती है जिसका यह दावा होता है कि वह जिसके पक्ष में कलम चलायेगी वह चुनाव जीत ही जायेगा। देश के कई अखबार ऐसे हैं जिन पर पार्टी और नेता विशेष का ठप्पा लगा हुआ है। पाठक भी जानते समझते हैं कि अमुक अखबार किस नेता और पूंजीपति के हाथों बिका हुआ हैं। इसलिए जो बुद्धिजीवी पाठकों को बेवकूफ समझते हैं वे कृपया अपनी भूल को सुधार लें। देश की तीस से अधिक पत्रिकाओं के प्रकाशक, मालिक और संपादक श्री परेश नाथ जो कि भारतीय भाषाई समाचार पत्र संघटन के अध्यक्ष भी हैं जब यह कहते हैं कि पेड न्यूज का मामला पाठकों पर छो‹ड देना चाहिए तो गलत नहीं कहते। पाठक अंधा नहीं है। वह सब कुछ देख-समझ रहा है। उसे भी अपना फैसला लेना आता है। कुछ कलमबाज इस भ्रम में हैं या जानबूझ कर भ्रम पैदा कर रहे हैं कि सजग पाठकों को खबरों और विज्ञापनों में फर्क करना नहीं आता। पाठकों को उल्लू समझने वाले तथाकथित विद्धान जो इन दिनों उचक-उचक कर बयानबाजी कर रहे हैं और पेड न्यूज को पत्रकारिता का कैंसर बता रहे हैं उनसे कोई यह भी तो पूछे कि श्रीमानजी अभी तक आप कहां थे? इस महामारी ने तो सन २००४ में ही अपनी जबरदस्त ज‹डे फैला दी थीं। उससे पहले भी धनासेठों के अखबारों में राजनेताओं, उद्योगपतियों और माफियाओं की आरती गाकर उन्हें खुश किया जाता था। यह काम मुफ्त में तो नहीं होता था। वैसे यह काम आज भी होता है। सवाल यह है कि ब‹डे-ब‹डे अखबारों में जो तथाकथित बुद्धिजीवी संपादक लाखों की तनख्वाह लेकर कम करते आये हैं उनकी बुद्धि कहां घास चरती रहती है? आज तक यह सुनने में नहीं आया है कि किसी संपादक ने पेड न्यूज के विरोध में आवाज बुलंद की हो और अपनी नौकरी पर लात मारी हो। लाखों रुपये की तनख्वाह पर ऐश करने वालों को होश तब आता है जब वे नौकरी से हाथ धो बैठते हैं। देश के अधिकांश सुजान और महान पत्रकारों की भी यही हालत है। यह चिल्लाते तब हैं जब इन पर आती है। वर्ना रजाई ओ‹ढकर घी पीते रहते हैं। जिस दिन इस देश में दस-बीस प्रभाष जोशी पैदा हो जाएंगे उस दिन मीडिया का चेहरा अपने आप बदल जायेगा। पर क्या आपको ऐसा लगता है कि ऐसा हो पायेगा?