Thursday, August 5, 2021

बिल्लू बादशाह का साक्षात्कार

    दूसरों के रहमो-करम पर अपनी जिन्दगी बसर करने वालों के तर्क और विचार आपको स्तब्ध कर सकते हैं। उनके चेहरे पर शर्मिंदगी नहीं, अधिकार के भाव नज़र आते हैं। उनके विचार से किसी को भी उन्हें उपदेश और सीख देने का कोई हक नहीं।
    हमारे एक मित्र ने किसी दिन राह चलते एक हट्टे-कट्टे भिखारी को भीख मांगते देख टोक दिया कि हाथ-पैर सलामत होने के बावजूद भी तुम्हें भीख मांगते शर्म नहीं आती? मुफ्त की खाने की बजाय कहीं नौकरी क्यों नहीं कर लेते! भिखारी ने ऐंठते हुए पूछा, ‘क्या आप देंगे मुझे नौकरी? मैं अभी आपके साथ चलने को तैयार हूं। हां, भीख से मैं हर माह पंद्रह-बीस हजार रुपये बड़ी आसानी से कमा लेता हूं। इतने से तो एक धेला भी कम नहीं चलेगा।’’ मित्र को भिखारी के तन कर बोलने के तीखे अंदाज ने सन्न और निरूत्तर कर दिया। उन्हें अपने सामने हारा सा देखकर भिखारी यह सफाई और सलाह देने से भी नहीं चूका, ‘‘आप से ज्यादा मुझे मालूम है कि भीख मांगना हर पल नाक कटवाने और डूब मरने जैसा है। फिर भी मन मारकर मैं इसे कर रहा हूं तो मेरी भी कोई मजबूरी होगी श्रीमान...। माना कि आप सक्षम हैं, पढ़े-लिखे हैं लेकिन फिर भी बहुत सोच-समझ कर अपना मुंह खोला करें...।’’
    कुछ महीने पहले एक बड़ी रोचक खबर पढ़ी थी। अपने ही महानगर में बिल्लू बादशाह नाम का एक करोड़पति भिखारी रहता है। नामी-गिरामी लोगों के साफ-सुथरे इलाके में बनी सर्वसुविधा युक्त दस मंजिला इमारत में उसका अपना करोड़ों रुपये का सुसज्जित फ्लैट है। उसी भव्य इमारत के ऐन सामने तेजी से उछलते एक दैनिक समाचार पत्र का कार्यालय है। जहां पर एक से एक विद्वान पत्रकार, संपादक तथा मालिक विराजते हैं। अखबारों में बिल्लू की अमीरी के बखान ने उससे मिलने के लिए प्रेरित कर दिया। काफी दिनों तक मैं उससे मिलने के लिए इधर-उधर के जुगाड़ लगाता रहा तब कहीं जाकर उससे मिलने का अवसर मिल पाया। उसके यहां आने से पहले एकाएक मुझे अपने मित्र और उस हट्टे-कट्टे भिखारी के बीच हुई शाब्दिक उग्र मुठभेड़ की याद हो आयी। तभी मैंने ठान लिया कि बिल्लू बादशाह से कोई भड़काऊ सवाल नहीं करूंगा। मैं तो बस अपने अंदर के जिज्ञासु पत्रकार को ऐसे सवाल करने की ही छूट दूंगा जो उसके स्वाभिमान को कतई चोटिल न करें। बिल्लू बादशाह के विशाल शानदार फ्लैट के हालनुमा कमरे में लगे कीमती सोफे पर बैठने का इशारा कर उसका सुरक्षा गार्ड मुझे यह कहते हुए ओझल हो गया कि दादा अभी तैयार हो रहे हैं। आपको कुछ देर इंतजार करना होगा। वो इंतजार महज पांच-सात मिनट का ही था। एक दुबले-पतले जींस- टी शर्ट धारी शख्स ने सामने की गद्देदार कुर्सी पर बैठते ही बड़ी अदब के साथ नमस्कार करते हुए कहा, ‘‘क्षमा चाहता हूं, आपको इंतजार करना पड़ा। मुमताज भाई ने मुझे कुछ दिन पहले बता दिया था कि ‘जलती कलम’ के पत्रकार साहेब मिलने को उत्सुक हैं। सच कहता हूं, मैं तो अखबारों के संपादकों तथा पत्रकारों से मिल-मिल कर पक गया हूं। सभी के पास एक से सवाल होते हैं। फिर मैंने ऐसा कौन सा किला फतह कर लिया है, जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया...?’’
    ‘‘बिल्लू भाई, आपने जो कमाल किया है उसके लिए पहले तो मेरी बधाई और शुभकामनाएं स्वीकारें। मैं आपसे कोई भी ऐसा सवाल नहीं करूंगा जो घिसा पिटा हो। मैं तो आपकी संघर्ष गाथा देश और दुनिया तक पहुंचाना चाहता हूं, ताकि दूसरों को भी संघर्ष करने की प्रेरणा मिल सके।’’ मेरे स्पष्टीकरण ने बिल्लू के चेहरे पर जो चमक बिखेरी वो मुझे बहुत अच्छी लगी। उसने मुस्कुराते हुए किसी को आवाज देकर तुरंत गर्मा-गर्म कॉफी लाने को कहा। कॉफी की पहली चुस्की के साथ ही मैंने अपने प्रश्नों का पिटारा खोल दिया......
    ‘‘देश के नंबर वन धनवान भिखारी होने पर बिल्लू बादशाह को कैसा लगता है?’’
    ‘‘दिल बाग-बाग हो जाता है। वर्षों तक खून-पसीना बहाने के बाद मैं आज जहां पहुंचा हूं उसके चर्चे मुझे और मेहनत करने की प्रेरणा देते हैं। मुझे पक्का यकीन है कि ऊपर वाले ने बहुत सोच-विचार कर इन अजूबे टूट-फूटे हाथ पैरों के साथ मुझे इस धरती पर भेजा है। यह अगर दुरुस्त होते तो मैं भी कड़कती धूप में करोड़ों बेरोजगारों की तरह लंबी कतार में खाली पेट पसीना-पसीना होता नज़र आता।’’
    ‘‘बिल्लू बादशाह एक बात कहूं...बुरा नहीं मानना। ऊपर वाले ने अब आपको मालामाल कर ही दिया है तो अब आप अपनी राह बदल क्यों नहीं लेते! इन बेतहाशा आढ़े-तेढ़े हाथ-पैरों का किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज करवा कर सामान्य इंसान की तरह जीने का आपका मन नहीं होता? आपको पता होना चाहिए  कि अपनी अपंगता की नुमाइश कर भीख मांगना लोगों की संवेदनशीलता और दयालुता के साथ धोखाधड़ी और घोर अपराध है। देश में लाखों लोग हैं जिनके दोनों हाथ-पैर नहीं हैं फिर भी उन्होंने तो भीख का कटोरा नहीं थामा। उन्होंने तो अपने अथाह साहस तथा अटूट हिम्मत की बदौलत हतप्रभ कर देने वाली सफलताओं और बुलंदियों के शीर्ष तक पहुंच कर इंसान होने का वास्तविक अर्थ बताया है।......’’
    भावावेश में बिल्लू सेठ पर तीखा प्रहार कर मैंने खुद से किये वायदे की डोर को एक ही झटके में तोड़ने की भूल कर दी। मुझे अपनी बेसब्री पर गुस्सा आने लगा, बिल्लू बादशाह आग-बबूला हो उठा...
    ‘‘आप लोगों को दूसरों पर तीर चलाने में बड़ा मज़ा आता है। अधिकांश मीडिया वाले कितने दूध के धुले हैं, सारी दुनिया जानती है। वो जो सामने दैनिक ‘उजला दामन’ का कार्यालय है, उसकी असलियत तो आपको भी पता होगी। इन उजला दामन वालों ने अखबार की आड़ में पचासों काले-नीले-पीले धंधे जमा कर जो धोखाधड़ियां की हैं, क्या वे आपकी निगाह में अपराध नहीं?
    कोयले की खदाने, कंस्ट्रक्शन, ऊर्जा, ऑयल एंड गैस, मॉल, होटल्स, टेली कम्युनिकेशन, थर्मल प्लांट आदि-आदि के खरबों के धंधे, कारोबार ‘उजला दामन’ के प्रकाशन के पश्चात ही खड़े हो पाए हैं। मेरा दावा है कि यदि इन महाजुगाड़ू, गुंडागर्दी और भिखारी प्रवृत्ति के मालिकों के पास अखबार नहीं होता तो ये कहीं भी नजर नहीं आते। इन्होंने बैंकों से भी हजारों-करोड़ का लोन हथिया रखा है जो कभी भी डूब सकता है। वर्षों से ये चतुर खिलाड़ी बोगस कंपनियां बनाकर हजारों-करोड़ की टैक्स चोरी करते चले आ रहे हैं। अभी हाल ही में जब इन ठगों, लुटेरों के यहां आयकर का छापा पड़ा तो  इनके खरीदे हुए चेहरे शोर मचाने लगे कि ये तो लोकतंत्र के चौथे खम्भे का अपमान है। अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। इस सच को छिपाने की पूरी कोशिश की गयी कि इनके काले धंधों को बेनकाब करने के लिए ही छापे डाले गये हैं। अखबार से इस धरपकड़ का कोई लेना-देना नहीं। इन धूर्तों की तरह छल, कपट करने की तो मेरे जैसे मेहनतकश सोच भी नहीं सकते। जंगलों तथा किसानों की जमीनों को हड़पने वाले इन काले दामन वाले धनपशुओं के तमाम काले चिट्ठों से जनता भी वाकिफ है, लेकिन बेचारी अपनी मजबूरियों के बोझ तले दबी हुई है। वो जो सामने ‘उजला दामन’ की सात मंजिला इमारत तनी है...वो भी पूरी तरह से अवैध है लेकिन सरकार और प्रशासन अंधा बना हुआ है। इसी इमारत के पीछे गरीबों, बदहालों की सैकड़ों झोपड़ियों को प्रशासन ने बीते सप्ताह उजाड़ कर उन्हें बेघर कर दिया।’’
    ‘‘ अरे वाह, आपको तो सभी की सटीक खबर है। अब यह तो बताओ कि आप पढ़े कहां तक हो?’’
    ‘‘समाजशास्त्र में एमए किया है मैंने पत्रकार भाई, आप बताओ कि ये गुंडागर्दी नहीं तो क्या है कि कुछ शातिर लोग अखबार निकालते ही इसलिए हैं कि अपनी धौंस दिखाकर उद्योगपतियों, अफसरों, शासन-प्रशासन आदि को डराते-धमकाते रहें और वो सब पाते और हथियाते रहें जो इन्होंने सोच रखा है। कोई यदि इनके इशारे पर नहीं नाचे तो उसके खिलाफ मनमानी खबरें छाप-छाप कर उसकी नाक में दम कर देते हैं। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि शहर में ऐसे कुछ पत्रकार भी हैं जो दिवाली, दशहरा और 15 अगस्त के अवसर पर लिफाफा लेने के लिए मेरे यहां नियमित पहुंच जाते हैं। मैं भी कभी उन्हें निराश नहीं करता।
    ‘‘बादशाह अब किसी दूसरे विषय पर बातचीत करते हैं। मैंने सुना है कि तुमने भिक्षावृति को बढ़ावा देने के लिए स्कूल भी खोल रखा है?’’
    ‘‘सही सुना है आपने। लेकिन ये आरोप गलत है कि मैं किसी को भीख मांगने के लिए प्रेरित करता हूं। इसकी कमायी का आकर्षण ही अच्छे-अच्छों को कटोरा पकड़ा देता है। पिछले बारह वर्ष से मेरे द्वारा भिक्षा प्रशिक्षण विद्यालय का संचालन किया जा रहा है। मेरे यहां से शिक्षित-दीक्षित होकर निकले हजारों लड़के-लड़कियां देश भर के शहरों में भीख मांग कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। मेरे विद्यालय से कई मां-बाप अपनी बच्चियों को भीख मांगने की ट्रेनिंग दिलवाने के लिए दौड़े-दौड़े चले आते हैं। यह निकम्मे मां-बाप अपनी लड़कियों की कमायी पर ऐश कर रहे हैं। इनकी छोटी-छोटी लड़कियां सुबह घर से निकलती हैैं और रात को तभी घर लौटती हैं जब उनकी झोली में चार-पांच सौ रुपये जमा हो जाते हैं। जिस दिन कम भीख मिलती है उस रात को उन्हें भूखे सोने के साथ-साथ थप्पड़ों, घूसों और डंडों से पिटना पड़ता है।
    एक सच और भी बताना चाहता हूं कि यदि अधिकांश भीख मांगने वालों में शराब, भांग, चरस, गांजा पीने की लत न होती तो वे भी लाखों में खेल रहे होते। पत्रकार जी, अब आप विदायी लें। आज रविवार है। रात को मेरे फार्म हाऊस पर देशी-विदेशी न्यूज चैनल वालों का जमावड़ा लगने वाला है। आप भी चाहें तो आ सकते हैं। शराब, कबाब और शबाब का पूरा इंतजाम किया गया है। चैनलों के सवालों के जवाब देने के लिए मुझे तैयारी भी करनी हैं। अखबारों में अपने नाम की चमक और शोहरत देखने के बाद अब टीवी पर पूरी तरह से छाने की मेरी बारी है। अब मुझे यकीन होने लगा है कि मेरा नेता बनने का सपना भी जल्द पूरा होगा। विधायक, सांसद और मंत्री बनने की मेरी बड़ी तमन्ना है। मुझे पक्का भरोसा है कि आप लोगों के साथ और दुआ से मेरा ये सपना भी जरूर साकार होगा। वैसे भी दोनों काम हैं तो एक जैसे ही। यहां नोटों की भीख मांगनी पड़ती है, राजनीति में पूरे दमखम के साथ वोटों की भीख भी मांग लेंगे। फिर अपने पास वोट खरीदने के लिए धन की भी कोई कमी नहीं। आखिर अपने देश-प्रदेश के अधिकांश नेता इसी माया के चमत्कार से ही तो हर चुनाव में ‘विजयश्री’ का सेहरा बांधते चले आ रहे हैं...।