वे सड़क किनारे ठेले लगाकर चाट, पोहा, आलू टिक्की, गोल गप्पे, चिल्ली पनीर, मिसल, मोमेज, चाउमिन, पास्ता आदि बेचते हैं। छोटी-छोटी पान दुकान वालों के भी अपने-अपने जलवे हैं। कई लोग इन्हें छोटा काम मानते हैं। इन्हें करने में उन्हें शर्म महसूस होती है। जब इन्होंने इन मामूली से लगने वाले काम धंधों की शुरुआत की थी तब इन्हें भी ऐसा ही लगता था। बड़ी पूंजी होती तो कपड़ा दुकान, रेडिमेड स्टोर, जनरल स्टोर, किराना शॉप या कोई बड़ा सा होटल, रेस्टारेंट खोलते और शान से गद्दी या काउंटर पर बैठकर अपना हुक्म चलाते। मजबूरी में प्रारंभ किये गये छोटे काम से जब नाम होने लगा, मोटी कमायी होने लगी तो बड़े-बड़ों की नजरें उन पर गड़ गयीं। आयकर विभाग भी चौकन्ना हो गया। पकौड़े, समोसे, मिसल, आमलेट, चिल्ली पनीर आदि के ठेले लगाने वाले तो ढेरों हैं, लेकिन डंका हर किसी का नहीं बजता। जब ‘स्वाद’ और व्यवहार की धूम मचती है, तभी ग्राहकों की कतारें लगती हैं। इस उपलब्धि के लिए खून-पसीना भी बहाना पड़ता है। लाज-शर्म को भी त्यागना पड़ता है।
अभी हाल ही में कानपुर में लगभग ढाई सौ से अधिक ऐसे कबाड़ी ठेले और खोमचे वालों का पता चला है जो करोड़पति हैं। यकीनन यह करिश्मा उनकी अटूट मेहनत का प्रतिफल है। ऐसे करोड़पति देश के हर शहर में हैं। उनके पास आलीशान महंगी कारें हैं। रहने को बड़े-बड़े घर हैं। वे नियमित विदेश भी जाते हैं और उनके बच्चे बेहतरीन स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हैं। मोटी कमायी होने के बावजूद ये अमीर न आयकर देते हैं न जीएसटी। मैले-कुचैले रहकर धनकुबेर बन जाना सफेदपोशों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं। दो वर्ष पूर्व सरकार ने बेरोजगारों को पकौड़े, समोसे बनाकर बेचने की सलाह दी थी तो कई पढ़े-लिखों को बड़ा गुस्सा आया था। अपनी तौहीन लगी थी उन्हें यह सलाह। सरकार को निशाने पर लेकर खूब शोर मचाया गया था कि सरकार लोगों को रोजगार और नौकरी देने में असमर्थ है इसलिए ठेले, खोमचे लगाकर ऐसा काम करने का परामर्श दे रही है जो सम्मानजनक नहीं है।
देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अपनी असली कमायी छुपाते हैं। उन्हें सुविधाएं तो चाहिएं, लेकिन टैक्स भरना मंजूर नहीं। आलीशान कोठियों में रहते हैं, लेकिन खुद को गरीब बताते हैं। उन्हें इतनी सी बात भी समझ में नहीं आती कि उनके बच्चों के स्कूल, कॉलेजों के खर्चे और उन्हें मुहैया कराई गई स्कूटर, मोटर सायकल तथा कारें कहां छिप पाती हैं। इन पंक्तियों के लेखक का कई टैक्स चोरों से मिलना-जुलना होता रहता है। उनके पास अपने-अपने तर्क और सबूत भी हैं। कोरोना काल ने तो उन्हें उनकी चालाकियों को जायज ठहराने के कई बहाने दे दिये हैं। उनकी शिकायत है कि जनता से वसूले जाने वाले अधिकांश टैक्स की रकम तो मंत्रियों, नेताओं और प्रशासकों के ठाठबाट पर खर्च हो जाती है। अपने यहां चंद राजनेता ही ऐसे हैं जिन्हें ईमानदार कहा जा सकता है। अधिकांश तो महा भ्रष्टाचारी हैं। इन्हीं की वजह से देश के विकास का पहिया रेंग-रेंग कर चल रहा है। सरकारी अस्पतालों में कैसी सुविधाएं हैं उसका सच सभी के सामने आ चुका। न पर्याप्त बेड और न ही आक्सीजन जैसी जरूरी सुविधाएं। पता नहीं कितने देशवासी तो कोरोना काल में सरकारी बदहाली के चलते चल बसे।
विदेशों में तो सरकारें ही जनता की बीमारी का खर्च उठाती हैं, उनके बच्चों को शिक्षा दिलवाती हैं, बुजुर्गों, असहायों की भरपूर सहायता करती है, लेकिन भारत वर्ष में तो बस भर्राशाही और लूटमारी है। ऐसे में ईमानदारी से करदाता का धर्म निभाने का मतलब है भ्रष्टाचारी, लुटेरों की तिजोरी का और वजन बढ़ाते चले जाना। अगर सत्ताधीशों ने सजगता और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया होता तो कोई भी देशवासी अपनी आमदनी नहीं छिपाता। दिल खोलकर सभी टैक्स भरता। 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में मात्र डेढ़ करोड़ लोगों के करदाता होने की खबरें मीडिया में छा कर वतन की बदनामी नहीं करातीं।
यह कलमकार इन शिकायतीबाजों से कुछ तो सहमत है, लेकिन पूरी तरह से समर्थन हर्गिज नहीं करता। इनमें से अधिकांश वो लोग हैं जिन्हें उनके ही स्वार्थ ने अंधा बना दिया है। इन्हें देश के गरीब और गरीबी नहीं दिखती। इन्होंने जो धन-दौलत कमायी है वो इसी देश के साधनों तथा मेहनतकश लोगों की बदौलत आयी है। मालदार बने रहने के लिए ये रईसों की जमात क्या-क्या नहीं करती। टैक्स बचाने के लिए चतुर-चालाक चार्टर्ड एकाउंटेंट की शरण में जाती है। बेनामी संपत्ति बनाती है। चुनाव के समय वोट देने में इन्हें शर्म आती है। जब सभी मतदान कर रहे होते हैं तब यह लोग छुट्टी मनाते हैं। कोई इनसे सवाल करे तो फटाक से कह देते हैं कि इस देश में कुछ भी नहीं बदलने वाला। इसे तो भ्रष्टाचारी नेताओं ने अपने कब्जे में कर रखा है। इन बददिमाग अहंकारी, आरामपरस्त लोगों की अक्ल के दरवाजे पता नहीं कब खुलेंगे। अरे, तुम्हीं तो हो जो अंतत: भ्रष्ट और बेइमान नेताओं को चुनाव में विजयी बनाते होे। तुम लोगों को तो खून-पसीना बहाने वालों का सम्मान करना ही नहीं आता। बस, टोपीबाजों के समक्ष ही नतमस्तक होते रहते हो।
जब इज्जत और सम्मान की बात आयी है तो इस सच को भी क्या छिपाना कि अपने यहां दिवाला निकालने को भी काबिलियत और तरक्की की निशानी मानने वाले लोग भरे पड़े हैं। ये लोग दिवाला पीट चुके उन परिवारों से अपने लड़के-लड़की का रिश्ता जोड़ने में गर्व महसूस करते हैं जो दिवालिया हो जाते हैं। इनसे रिश्ता जोड़ने वालों को पता होता है कि कोई भी दिवाला निकालने वाला बेवकूफ नहीं होता। वह तो बैंकों तथा अपने लेनदारों को बेवकूफ बनाकर अपनी नींव मजबूत कर लेता है। बड़े-बड़े शहरों के बड़े-बड़े कारोबारियों, व्यापारियों, उद्योगपतियों के दिवालिया होने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। व्यापार जगत में जो इस कला में पारंगत नहीं उसका चंद्रकांत जैन जैसा हश्र कर दिया जाता है। गुजरात के शहर सूरत में बीते सप्ताह कर्ज के दो-ढाई लाख रुपयों का भुगतान नहीं कर पाने के कारण चंद्रकांत को निर्वस्त्र कर पहले तो साड़ी पहनायी गई फिर उसके हाथ में चोर लिखी तख्ती पकड़ा कर कपड़ा मार्केट में घुमाया गया। पचपन साल का अस्वस्थ व्यापारी किसी तरह से सिर झुकाये घिसट-घिसट कर चल रहा था। तमाशबीनों को बड़ा मज़ा आ रहा था। उन्हीं में से कुछ लोगों ने इस तमाशे की जीभरकर तस्वीरें खींचीं और वीडियो भी बनाये। इस भीड़ में कुछ ऐसे थोक कपड़ा व्यापारी भी शामिल थे, जिन्होंने कभी हाथ खड़े कर करोड़ों रुपये अंदर कर लिये थे। आज वे मार्केट में छाती तानकर चलते हैं। कई तो शहर छोड़कर गायब हो चुके हैं...।
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