लोकतंत्र की जय...
काल मार्क्स कह गये हैं, सŸाा इंसान को भ्रष्ट बना देती है। कांग्रेस के नेता ने जयपुर के चिंतन शिविर में प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए बड़े बुझे मन से कहा था कि सŸाा तो जहर है। देश के एक केंद्रीय मंत्री अक्सर कहते देखे जाते हैं कि वे राजनीति में आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं। वे तो इतने अक्लमंद हैं कि अगर व्यापार कर रहे होते तो हर शाम 10 करोड़ रुपए लेकर अपने घर जाते और सुख की नींद सो जाते। अपने देश में कई राजनेता ऐसे हैं जो हमेशा यही दर्शाते नहीं थकते कि जनसेवा की भावना से ओतप्रोत होने के कारण उन्होंने राजनीति का दामन थामा है। उनसे जनता के कष्ट देखे नहीं जाते। वे हर किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं। जनसेवा के लिए उन्होंने हंसते-हंसते अपनी सभी इच्छाओं और सुख-सुविधाओं को भी कुर्बान कर दिया है।
दुनिया में ऐसा कौन सा इंसान है जो धन नहीं पाना चाहता? धनपति बनने की चाहत तो ताउम्र बनी रहती है, लेकिन सवाल यह है कि कितने लोग अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर धनपति बनते हैं? बड़ा ही आसान जवाब है। अधिकांश लोगों की यही मंशा होती है कि उन्हें धन पाने के लिए मेहनत ही न करना पड़े। अपराध के मार्ग पर चलने वाले लोगों को बहुत जल्दी धनपति बनते देखा जाता है। भ्रष्ट नौकरशाह और राजनीति के खिलाड़ियों के यहां भी देखते ही देखते दौलत का अंबार लग जाता है। भ्रष्टों के बारे में तरह-तरह की बातें होना आम बात है और यह भी आम बात है कि हर भ्रष्टाचारी सीना तानकर ईमानदार होने के दावे करता है। राजनेताओं की तो बात ही अलग है। वे खुद को खास समझते हैं। आम और खास लोगों के मसीहा। सभी को अपनी बातों के मक्कड़जाल में उलझाये रखते हैं।
जो सŸाा को ज़हर कहते हैं उनसे जब यह पूछा जाता है कि आप इस ज़हर से मुंह क्यों नहीं मोड़ लेते। ज़हर को षहद की तरह सतत चूसने का मोह त्याग क्यों नहीं देते?... उनका जो जवाब होता है उसका यही अभिप्राय होता है कि हम दूसरों के लिए इस विष को पीते हैं। हम अपने देशवासियों को कष्ट में नहीं देख सकते। हमारे पूर्वजों ने देश सेवा का जो पाठ पढ़ाया है और दीन-दुखियों के कष्टों के निवारण की जो सीख दी है उससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते।
देशवासियों के मन में अगर झांका जाए तो वहां यही इबारत लिखी मिलेगी कि इस धरती पर नेताओं और सŸााधीशों से जहरीला, धूर्त, कपटी और विश्वासघाती और कोई प्राणी नहीं है। भारत के अधिकांष नेताओं और सŸााधीशों ने जनता को जख्म ही दिए हैं। इनके संपूर्ण सच से वाकिफ होने के बावजूद भी इनके नाटकों को देखने और शातिर बोल वचनों को चुपचाप सुनने के अलावा देशवासियों के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। खुद को सच्चा जनसेवी बताने वाले अधिकांष विधायक, सांसद, मंत्री तरह-तरह के कारोबार करते हैं। सिंचाई, लोकनिर्माण और सभी सरकारी ठेके इन्हीं के हिस्से में आते हैं, जिनसे यह करोड़ों-अरबों कमाते हैं। करोड़ों की सरकारी जमीनें कौड़ियों के भाव हथियाने वाले यह जनसेवक अनपढ़ होते हुए भी बड़े-बड़े इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के मालिक बन शिक्षा जगत का मजाक उड़ाते हुए रातों-रात मालामाल हो जाते हैं।
दरअसल भारत की राजनीति में तरह-तरह के व्यापारियों का वर्चस्व है, जिनके नंगे सच को भी नजरअंदाज करना पड़ता है। दलितों और शोषितों की मसीहा, जिन्हें बहनजी कहा जाता है उन्हें कौन नहीं जानता। वर्ष 2003 में उनकी कुल संपŸिा लगभग एक करोड़ रुपए के आसपास थी। 2012 में राज्यसभा का नामांकन भरते समय उन्होंने खुद अपनी संपŸिा 111 करोड़ घोषित की। ऐसी गगनचुम्बी तरक्की राजनीति के धंधे में ही संभव है। उनका कहना है कि उनके समर्थक उन्हें धन देते हैं। बहनजी से जब यह सवाल किया जाता है कि उन्हें जो चंदा और सहायता दी जाती है वह तो पार्टी के लिए होती है उनके निजी उपयोग के लिए नहीं....तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता। यह अकेले बहनजी की बात नहीं। देश में अधिकांश राजनीतिक पार्टियां ऐसे ही चल रही हैं। बिल्कुल व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह। यहां के कुछ चतुर-होशियार राजनेता शक्कर कारखाने स्थापित कर गन्ने से चीनी बनाने के बजाय एलकोहल तैयार करते हैं, जिसे बड़े-बड़े शराब व्यवसायियों को सप्लाई कर मोटी कमायी कर अपनी तिजोरी भरने के बावजूद खुद को असली राष्ट्रभक्त दर्शाते हैं। कुछ ही नेता ऐसे होंगे जिन्होंने आय से अधिक सम्पŸिा नहीं जुटा कर रखी होगी। भारतीय लोकतंत्र का असली मज़ा तो यही लोग लूट रहे हैं। दरअसल यह लोग हद दर्जे के घुटे हुए सौदागर हैं, जिन्होंने अथाह मालामाल होने के लिए राजनीति में घुसपैठ कर ली है। अच्छे लोग राजनीति से दूरी बनाये रहें इसलिये यह चतुर-होशियार चेहरे उन्हें डराते रहते हैं। देश इनके चंगुल में फंस कर रह गया है। बड़े-बुजुर्ग कहते भी रहे हैं कि जिस देश का राजा व्यापारी होता है वहां की प्रजा भूखी मरने को विवश होती है और जिस देश की सŸाा में चतुर कारोबारियों का वर्चस्व होता है वहां अमीर और अमीर तथा गरीब लगातार बरबाद होते चले जाते हैं। फिर अन्ततः एक दिन ऐसा भी आता है जब उन्हें अमीरों का गुलाम बनकर रह जाना पड़ता है।
काल मार्क्स कह गये हैं, सŸाा इंसान को भ्रष्ट बना देती है। कांग्रेस के नेता ने जयपुर के चिंतन शिविर में प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए बड़े बुझे मन से कहा था कि सŸाा तो जहर है। देश के एक केंद्रीय मंत्री अक्सर कहते देखे जाते हैं कि वे राजनीति में आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं। वे तो इतने अक्लमंद हैं कि अगर व्यापार कर रहे होते तो हर शाम 10 करोड़ रुपए लेकर अपने घर जाते और सुख की नींद सो जाते। अपने देश में कई राजनेता ऐसे हैं जो हमेशा यही दर्शाते नहीं थकते कि जनसेवा की भावना से ओतप्रोत होने के कारण उन्होंने राजनीति का दामन थामा है। उनसे जनता के कष्ट देखे नहीं जाते। वे हर किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं। जनसेवा के लिए उन्होंने हंसते-हंसते अपनी सभी इच्छाओं और सुख-सुविधाओं को भी कुर्बान कर दिया है।
दुनिया में ऐसा कौन सा इंसान है जो धन नहीं पाना चाहता? धनपति बनने की चाहत तो ताउम्र बनी रहती है, लेकिन सवाल यह है कि कितने लोग अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर धनपति बनते हैं? बड़ा ही आसान जवाब है। अधिकांश लोगों की यही मंशा होती है कि उन्हें धन पाने के लिए मेहनत ही न करना पड़े। अपराध के मार्ग पर चलने वाले लोगों को बहुत जल्दी धनपति बनते देखा जाता है। भ्रष्ट नौकरशाह और राजनीति के खिलाड़ियों के यहां भी देखते ही देखते दौलत का अंबार लग जाता है। भ्रष्टों के बारे में तरह-तरह की बातें होना आम बात है और यह भी आम बात है कि हर भ्रष्टाचारी सीना तानकर ईमानदार होने के दावे करता है। राजनेताओं की तो बात ही अलग है। वे खुद को खास समझते हैं। आम और खास लोगों के मसीहा। सभी को अपनी बातों के मक्कड़जाल में उलझाये रखते हैं।
जो सŸाा को ज़हर कहते हैं उनसे जब यह पूछा जाता है कि आप इस ज़हर से मुंह क्यों नहीं मोड़ लेते। ज़हर को षहद की तरह सतत चूसने का मोह त्याग क्यों नहीं देते?... उनका जो जवाब होता है उसका यही अभिप्राय होता है कि हम दूसरों के लिए इस विष को पीते हैं। हम अपने देशवासियों को कष्ट में नहीं देख सकते। हमारे पूर्वजों ने देश सेवा का जो पाठ पढ़ाया है और दीन-दुखियों के कष्टों के निवारण की जो सीख दी है उससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते।
देशवासियों के मन में अगर झांका जाए तो वहां यही इबारत लिखी मिलेगी कि इस धरती पर नेताओं और सŸााधीशों से जहरीला, धूर्त, कपटी और विश्वासघाती और कोई प्राणी नहीं है। भारत के अधिकांष नेताओं और सŸााधीशों ने जनता को जख्म ही दिए हैं। इनके संपूर्ण सच से वाकिफ होने के बावजूद भी इनके नाटकों को देखने और शातिर बोल वचनों को चुपचाप सुनने के अलावा देशवासियों के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। खुद को सच्चा जनसेवी बताने वाले अधिकांष विधायक, सांसद, मंत्री तरह-तरह के कारोबार करते हैं। सिंचाई, लोकनिर्माण और सभी सरकारी ठेके इन्हीं के हिस्से में आते हैं, जिनसे यह करोड़ों-अरबों कमाते हैं। करोड़ों की सरकारी जमीनें कौड़ियों के भाव हथियाने वाले यह जनसेवक अनपढ़ होते हुए भी बड़े-बड़े इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के मालिक बन शिक्षा जगत का मजाक उड़ाते हुए रातों-रात मालामाल हो जाते हैं।
दरअसल भारत की राजनीति में तरह-तरह के व्यापारियों का वर्चस्व है, जिनके नंगे सच को भी नजरअंदाज करना पड़ता है। दलितों और शोषितों की मसीहा, जिन्हें बहनजी कहा जाता है उन्हें कौन नहीं जानता। वर्ष 2003 में उनकी कुल संपŸिा लगभग एक करोड़ रुपए के आसपास थी। 2012 में राज्यसभा का नामांकन भरते समय उन्होंने खुद अपनी संपŸिा 111 करोड़ घोषित की। ऐसी गगनचुम्बी तरक्की राजनीति के धंधे में ही संभव है। उनका कहना है कि उनके समर्थक उन्हें धन देते हैं। बहनजी से जब यह सवाल किया जाता है कि उन्हें जो चंदा और सहायता दी जाती है वह तो पार्टी के लिए होती है उनके निजी उपयोग के लिए नहीं....तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता। यह अकेले बहनजी की बात नहीं। देश में अधिकांश राजनीतिक पार्टियां ऐसे ही चल रही हैं। बिल्कुल व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह। यहां के कुछ चतुर-होशियार राजनेता शक्कर कारखाने स्थापित कर गन्ने से चीनी बनाने के बजाय एलकोहल तैयार करते हैं, जिसे बड़े-बड़े शराब व्यवसायियों को सप्लाई कर मोटी कमायी कर अपनी तिजोरी भरने के बावजूद खुद को असली राष्ट्रभक्त दर्शाते हैं। कुछ ही नेता ऐसे होंगे जिन्होंने आय से अधिक सम्पŸिा नहीं जुटा कर रखी होगी। भारतीय लोकतंत्र का असली मज़ा तो यही लोग लूट रहे हैं। दरअसल यह लोग हद दर्जे के घुटे हुए सौदागर हैं, जिन्होंने अथाह मालामाल होने के लिए राजनीति में घुसपैठ कर ली है। अच्छे लोग राजनीति से दूरी बनाये रहें इसलिये यह चतुर-होशियार चेहरे उन्हें डराते रहते हैं। देश इनके चंगुल में फंस कर रह गया है। बड़े-बुजुर्ग कहते भी रहे हैं कि जिस देश का राजा व्यापारी होता है वहां की प्रजा भूखी मरने को विवश होती है और जिस देश की सŸाा में चतुर कारोबारियों का वर्चस्व होता है वहां अमीर और अमीर तथा गरीब लगातार बरबाद होते चले जाते हैं। फिर अन्ततः एक दिन ऐसा भी आता है जब उन्हें अमीरों का गुलाम बनकर रह जाना पड़ता है।
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