अक्सर ऐसा होता है। जब कोई हमारा दूर का रिश्तेदार, दोस्त सा परिचित गुज़र जाता है तो हम संवेदना व्यक्त करते-करते उसकी उम्र भी पूछ लेते हैं। जैसे ही हमें उसके उम्रदराज होने का पता चलता है तो हमारे दु:ख प्रकट करने का अंदाज बदल जाता है। अक्सर ऐसा भी होता है कि खबर देने वाला व्यक्ति भी बडी सहजता से यह कहता है कि उनकी अच्छी-खासी उम्र हो चुकी थी। ऊपर वाले के लिखे को कौन बदल सकता है। यह बात भी अच्छी रही कि उन्हें अस्पताल का मुंह नहीं देखना पडा। ऐसा भी देखने में आता है कि जो लोग अपनी उम्र की नब्बे-पंचानबें वर्ष की दहलीज पार कर लेते हैं उनके स्वर्गवासी होने पर ज्यादा मातम नहीं मनाया जाता। उनके जिंदा रहते भी उनकी सोच, चाहत और भावनाओं की खास कद्र नहीं की जाती। इस मानवीय सोच को ताक पर रख दिया जाता है कि उनके भी अभी कई सपने अधूरे हो सकते हैं जिन्हें वे पूरा करना चाहते होंगे। हमारे यहां जन्मजात दिव्यांगों को भी सहानुभूति के सिवाय कुछ नहीं मिलता। उनमें भी कुछ अलग हटकर करने का ज़ज्बा हो सकता है इसकी कल्पना ही नहीं की जाती। इसलिए उन्हें उस वातावरण और शिक्षा-दीक्षा से वंचित रखा जाता है, जो दूसरों को हंसी-खुशी दी जाती है। दुनिया में कितने ही ऐसे उम्रदराज और जन्मजात दिव्यांग हुए हैं और जिन्होंने आम इंसानी सोच पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे गलत साबित कर दिखाया है...
उनका नाम है गुरूचरण सिंह। उम्र १०७ वर्ष। डिफेंस मिनिस्ट्री में सीनियर रिसेप्शन ऑफिसर थे। ३१ मार्च १९७१ को रिटायर हुए। कुछ दिन पूर्व उम्रदराज गुरूचरण के बाथरूम में गिरने से हीप में बायीं और फ्रेक्चर हो गया। उनके पोते उन्हें अस्पताल ले गए। डॉक्टरों को जब गुरूचरण की उम्र बतायी गयी तो वे असमंजस में पड गये। काफी देर तक वे आपस में सलाह करते रहे। अंतत: उन्होंने उनकी सर्जरी करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि अभी तक दुनिया में इस उम्र में किसी की सर्जरी नहीं हुई है। लेकिन गुरूचरण सर्जरी के लिए अड गए। उन्होंने अपने अच्छे स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा, 'मैं बेड पर लेटे रहना नहीं चाहता। जैसे मैं पूरी उम्र रहा हूं, वैसे ही अब रहना चाहता हूं। मुझे किसी पर आश्रित रहना कतई पसंद नहीं। बदनसीबी से ऐसे दिन कभी आए भी तो मर जाना पसंद करूंगा।' डॉक्टर उनकी जिद और सोच को देखकर हैरान रह गए। जब उनकी शारीरिक जांच की गई तो उन्हें पूरी तरह से फिट पाया गया। न ब्लड प्रेशर, न डायबिटिज, न ही वे कोई दवा ले रहे थे। आमतौर पर लंबी उम्र में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं लेकिन १०७ की उम्र में भी उनकी हड्डी में जरा भी कमजोरी नहीं आयी थी। उनकी जीने की ललक और फिटनेस से डॉक्टर बेहद प्रेरित हुए। पूरी टीम उत्साह और जोश के साथ सर्जरी की तैयारी में जुट गई। उनकी फिटनेस की वजह से एनेस्थीसिया दी गई और ४० मिनट में सर्जरी हो गयी। शनिवार को सर्जरी हुई। सोमवार को अपने पैरों पर खडे होकर वे अपने घर चल दिए। अस्पताल में उनकी चार पीढी के लोग साथ थे। उन्हें अच्छी तरह से चलते देख सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे। डॉक्टरों का दावा है कि इस उम्र में अनसिमेंटेंड इंप्लांट से हिप रिप्लेसमेंट की सफल सर्जरी कराने वाले गुरुचरण दुनिया के सबसे बुजुर्ग इंसान हैं। डॉक्टरों ने इस उपलब्धि को 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' के लिए भी भेज दिया है।
जिस उम्र में बडे-बडे तुर्रमखां ज्यादा भागदौड करने से घबराते हैं उसी उम्र में यदि कोई हिमालय फतह करने का इतिहास रचे तो उसके आत्मबल और शौर्य को सलाम तो किया ही जाना चाहिए। केरल में स्थित त्रिशूर में निवासरत चित्रण नक्बूदिरी पाद कुछ ही महीने के बाद अपने जीवन के सौ साल पूर्ण करने जा रहे हैं। अब तक उन्नतीस दफे हिमालय की अलग-अलग चोटियों को अपने कदमों से नाप चुके हैं। चित्रण का अभी भी मन नहीं भरा है। इस उम्र में भी उनका इतना हिम्मती और साहसी होना लोगों को स्तब्ध कर देता है। वे पूरी तरह से शाकाहारी हैं। फल और सब्जियां खूब खाते हैं। नियमित योग व व्यायाम करना उनकी आदत में शुुमार हो चुका है। चित्रण कहते हैं कि मेरे लिए हर दिन मेरा जन्मदिन होता है। मैं उपलब्धियों का जश्न मनाता हूं। अगर आप खुद को उम्रदराज महसूस करेंगे तो खुद को थका हुआ पायेंगे। जीवन थकने नहीं चलने का नाम है।
कुछ लोग कमजोरी को अपनी ताकत बनाकर दुनिया पर राज करते हैं तो कुछ अपनी कमजोरी और कमी के बोझ तले दबकर अपना नामों-निशां ही मिटाकर रख देते हैं। किसी ने गलत नहीं कहा है कि जिसने खुद पर यकीन कर लिया उसने समझो सारा संसार ही जीत लिया। १९८२ में मेलबर्न आस्ट्रेलिया में जन्मे निकोलस जेम्स आज की तारीख में एक विश्वप्रसिद्ध मोटिवेशन स्पीकर हैं। करोडों की कमायी करने वाले निकोलस के हाथ-पैर नहीं हैं। टेट्रा समोलिया सिड्रोंम बीमारी की वजह से मां के गर्भ से ही निकोलस के हाथ-पैर का विकास नहीं हो पाया था। बिना हाथ-पैर वाले इंसान की कल्पना भी कंपा कर रख देती है। तय है कि निकोलस के लिए जीवन का सफर कतई आसान नहीं था। स्कूल में सहपाठी निकोलस की अपंगता का मजाक उडाते तो उनके पास आहत होने के सिवा और कोई चारा नहीं होता था। माता-पिता और भाई बहन ने अगर हौसला नहीं बढाया होता तो उन्होंने दस साल की उम्र में ही आत्महत्या कर ली होती। उन्हीं की प्रेरणा से परमात्मा पर विश्वास करते हुए नई सोच और नई दिशा की राह पकड ली। मनोबल बढाने वाले साहित्य के असंख्य पन्नों को पढने और आत्मसात करने के बाद उन्हें यह सच भी समझ में आ गया कि लोगों की बातों की परवाह करना बेवकूफी है। जीवन में जो कुछ होता है, किसी मकसद से होता है। भय ही मनुष्य की सबसे बडी विकलांगता है। अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाने वाले निकोलस ने सत्रह वर्ष की उम्र में खुद का ही एक एनजीओ, 'लाइफ विदाउट लिंब्स' शुरू किया। आज दुनिया के बेहतरीन मोटिवेशनल स्पीकर्स में से एक माने जाने वाले यह अद्भुत योद्धा चालीस से अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। निकोलस एक प्रभावी वक्ता, लेखक, संगीतकार और पेंटर भी हैं। उन्हें बेखौफ होकर तैराकी करते देख लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। हमेशा उमंग और जोश में रहने वाले निकोलस जब अपने भाषणों में यह कहते हैं 'उम्मीद को खोना हाथ-पैर खोने से ज्यादा बुरा है, तो तालियों की गडगडाहट से हजारों श्रोताओं से भरा सभागृह गूंज उठता है। जो शख्स अपनी पत्नी का हाथ पकडने में पूरी तरह से अक्षम हो उससे कौन युवती शादी करेगी? इसी सवाल और विचार को अपने मन-मस्तिष्क में बसाये निकोलस पर एक खूबसूरत युवती का ऐसा दिल आया कि वह उसके साथ शादी के लिए अड गई। आज वे न सिर्फ शादीशुदा है, बल्कि दो बच्चों के पिता भी हैं।
उनका नाम है गुरूचरण सिंह। उम्र १०७ वर्ष। डिफेंस मिनिस्ट्री में सीनियर रिसेप्शन ऑफिसर थे। ३१ मार्च १९७१ को रिटायर हुए। कुछ दिन पूर्व उम्रदराज गुरूचरण के बाथरूम में गिरने से हीप में बायीं और फ्रेक्चर हो गया। उनके पोते उन्हें अस्पताल ले गए। डॉक्टरों को जब गुरूचरण की उम्र बतायी गयी तो वे असमंजस में पड गये। काफी देर तक वे आपस में सलाह करते रहे। अंतत: उन्होंने उनकी सर्जरी करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि अभी तक दुनिया में इस उम्र में किसी की सर्जरी नहीं हुई है। लेकिन गुरूचरण सर्जरी के लिए अड गए। उन्होंने अपने अच्छे स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा, 'मैं बेड पर लेटे रहना नहीं चाहता। जैसे मैं पूरी उम्र रहा हूं, वैसे ही अब रहना चाहता हूं। मुझे किसी पर आश्रित रहना कतई पसंद नहीं। बदनसीबी से ऐसे दिन कभी आए भी तो मर जाना पसंद करूंगा।' डॉक्टर उनकी जिद और सोच को देखकर हैरान रह गए। जब उनकी शारीरिक जांच की गई तो उन्हें पूरी तरह से फिट पाया गया। न ब्लड प्रेशर, न डायबिटिज, न ही वे कोई दवा ले रहे थे। आमतौर पर लंबी उम्र में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं लेकिन १०७ की उम्र में भी उनकी हड्डी में जरा भी कमजोरी नहीं आयी थी। उनकी जीने की ललक और फिटनेस से डॉक्टर बेहद प्रेरित हुए। पूरी टीम उत्साह और जोश के साथ सर्जरी की तैयारी में जुट गई। उनकी फिटनेस की वजह से एनेस्थीसिया दी गई और ४० मिनट में सर्जरी हो गयी। शनिवार को सर्जरी हुई। सोमवार को अपने पैरों पर खडे होकर वे अपने घर चल दिए। अस्पताल में उनकी चार पीढी के लोग साथ थे। उन्हें अच्छी तरह से चलते देख सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे। डॉक्टरों का दावा है कि इस उम्र में अनसिमेंटेंड इंप्लांट से हिप रिप्लेसमेंट की सफल सर्जरी कराने वाले गुरुचरण दुनिया के सबसे बुजुर्ग इंसान हैं। डॉक्टरों ने इस उपलब्धि को 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' के लिए भी भेज दिया है।
जिस उम्र में बडे-बडे तुर्रमखां ज्यादा भागदौड करने से घबराते हैं उसी उम्र में यदि कोई हिमालय फतह करने का इतिहास रचे तो उसके आत्मबल और शौर्य को सलाम तो किया ही जाना चाहिए। केरल में स्थित त्रिशूर में निवासरत चित्रण नक्बूदिरी पाद कुछ ही महीने के बाद अपने जीवन के सौ साल पूर्ण करने जा रहे हैं। अब तक उन्नतीस दफे हिमालय की अलग-अलग चोटियों को अपने कदमों से नाप चुके हैं। चित्रण का अभी भी मन नहीं भरा है। इस उम्र में भी उनका इतना हिम्मती और साहसी होना लोगों को स्तब्ध कर देता है। वे पूरी तरह से शाकाहारी हैं। फल और सब्जियां खूब खाते हैं। नियमित योग व व्यायाम करना उनकी आदत में शुुमार हो चुका है। चित्रण कहते हैं कि मेरे लिए हर दिन मेरा जन्मदिन होता है। मैं उपलब्धियों का जश्न मनाता हूं। अगर आप खुद को उम्रदराज महसूस करेंगे तो खुद को थका हुआ पायेंगे। जीवन थकने नहीं चलने का नाम है।
कुछ लोग कमजोरी को अपनी ताकत बनाकर दुनिया पर राज करते हैं तो कुछ अपनी कमजोरी और कमी के बोझ तले दबकर अपना नामों-निशां ही मिटाकर रख देते हैं। किसी ने गलत नहीं कहा है कि जिसने खुद पर यकीन कर लिया उसने समझो सारा संसार ही जीत लिया। १९८२ में मेलबर्न आस्ट्रेलिया में जन्मे निकोलस जेम्स आज की तारीख में एक विश्वप्रसिद्ध मोटिवेशन स्पीकर हैं। करोडों की कमायी करने वाले निकोलस के हाथ-पैर नहीं हैं। टेट्रा समोलिया सिड्रोंम बीमारी की वजह से मां के गर्भ से ही निकोलस के हाथ-पैर का विकास नहीं हो पाया था। बिना हाथ-पैर वाले इंसान की कल्पना भी कंपा कर रख देती है। तय है कि निकोलस के लिए जीवन का सफर कतई आसान नहीं था। स्कूल में सहपाठी निकोलस की अपंगता का मजाक उडाते तो उनके पास आहत होने के सिवा और कोई चारा नहीं होता था। माता-पिता और भाई बहन ने अगर हौसला नहीं बढाया होता तो उन्होंने दस साल की उम्र में ही आत्महत्या कर ली होती। उन्हीं की प्रेरणा से परमात्मा पर विश्वास करते हुए नई सोच और नई दिशा की राह पकड ली। मनोबल बढाने वाले साहित्य के असंख्य पन्नों को पढने और आत्मसात करने के बाद उन्हें यह सच भी समझ में आ गया कि लोगों की बातों की परवाह करना बेवकूफी है। जीवन में जो कुछ होता है, किसी मकसद से होता है। भय ही मनुष्य की सबसे बडी विकलांगता है। अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाने वाले निकोलस ने सत्रह वर्ष की उम्र में खुद का ही एक एनजीओ, 'लाइफ विदाउट लिंब्स' शुरू किया। आज दुनिया के बेहतरीन मोटिवेशनल स्पीकर्स में से एक माने जाने वाले यह अद्भुत योद्धा चालीस से अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। निकोलस एक प्रभावी वक्ता, लेखक, संगीतकार और पेंटर भी हैं। उन्हें बेखौफ होकर तैराकी करते देख लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। हमेशा उमंग और जोश में रहने वाले निकोलस जब अपने भाषणों में यह कहते हैं 'उम्मीद को खोना हाथ-पैर खोने से ज्यादा बुरा है, तो तालियों की गडगडाहट से हजारों श्रोताओं से भरा सभागृह गूंज उठता है। जो शख्स अपनी पत्नी का हाथ पकडने में पूरी तरह से अक्षम हो उससे कौन युवती शादी करेगी? इसी सवाल और विचार को अपने मन-मस्तिष्क में बसाये निकोलस पर एक खूबसूरत युवती का ऐसा दिल आया कि वह उसके साथ शादी के लिए अड गई। आज वे न सिर्फ शादीशुदा है, बल्कि दो बच्चों के पिता भी हैं।
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