Friday, January 25, 2019

खता की सज़ा?


उस दिन रात के लगभग दस बज चुके थे। मैं सोने की तैयारी कर रहा था। तभी मोबाइल स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमका। मैंने फोन उठा लिया। उधर से आवाज आई, ‘‘अंकल मैं कोरबा से आपके पुराने मित्र अनिल सहगल का बेटा बोल रहा हूं। पापा नहीं रहे। परसों शुक्रवार को पगड़ी रस्म है।’’ मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही फोन बंद हो गया। मैं जानना चाहता था कि सहगल अचानक कैसे चल बसा। सहगल मेरा कॉलेज के जमाने का दोस्त था। हालांकि कॉलेज छोड़ने के बाद हमारा कभी मिलना नहीं हो पाया। उसके पिता लोहे के बहुत बड़े कारोबारी थे, लेकिन सहगल साहित्य प्रेमी था। अक्सर कहा करता था कि वह कभी भी व्यापार के क्षेत्र में नहीं जाएगा। बी-कॉम की पढ़ाई के दौरान ही उसकी लिखी कविताएं और गज़लें यहां-वहां की पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। वह प्रकाशित कविताओं की कटिंग को ऐसे संभाल कर रखता था जैसे वे कोई अनमोल खजाना हों। बी.कॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद हम अपने-अपने शहर चले गये। मैं बिलासपुर में एक दैनिक समाचार में नौकरी करने लगा। उसने कोरबा में बर्तन की दुकान खोल ली थी। वैसे यह सच्चाई हैरान करने वाली थी। कुछ वर्षों के पश्चात मैं रायपुर जाकर रहने लगा। वहां पर भी लगभग बारह वर्ष तक विभिन्न अखबारों की नौकरी बजायी। उसके पष्चात अपने अखबार के प्रकाषन के इरादे के साथ नागपुर जा पहुंचा। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये। बच्चों के भी बच्चे हो गये। अपने काम के अलावा किसी को याद करने का समय ही नहीं मिला।
सातेक वर्ष पूर्व किसी पत्रिका के पन्ने पलटते-पलटते उसमें छपी कविता, कवि के नाम और उसकी तस्वीर पर नज़र थमी की थमी रह गई। जिस अनिल सहगल को मैं भूल चुका था वह एकाएक जैसे मेरे सामने आ खड़ा हुआ। कविता के साथ छपी फोटो बता रही थी कि उसे कवि की जवानी के दिनों में खींचा गया है। उसके बाद तो मैं विभिन्न पत्रिकाओं और दैनिकों के रविवार अंक में छपने वाली कविताओं और गज़लों पर नजरें गड़ाये रहता। कभी-कभार उसकी लिखी कविता और गज़ल का दीदार हो जाता। इसी दौरान एक पत्रिका में उसका मोबाइल नंबर कविता के साथ नजर आया तो मेरी उससे बातचीत भी होने लगी। उसी ने बताया कि बर्तन की दुकान कब की बंद हो चुकी है। दोनों बेटे विदेष में नौकरी कर रहे हैं। माता-पिता भी स्वर्ग सिधार गये हैं। पिता की जमीन-जायदाद और खेती बाड़ी पर उसके तीनों भाइयों ने कब्जा जमा लिया है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में समय-समय पर होने वाले कवि सम्मेलनों में उसे सम्मान के साथ बुलाया जाता है और अन्य कवियों की तुलना में उसे मोटे लिफाफे मिल जाते हैं। शहर की मुख्य सड़क पर खुद का घर है, जिसकी कीमत आज करोड़ों में है। घर के ऊपर के चार कमरे किराये पर दे रखे हैं, जिससे हर माह दस हजार रुपये मिल जाते हैं। हम दोनों की बड़े मज़े से कट रही है। मोबाइल पर होने वाली बातचीत में अक्सर मुझे यही आास होता कि वह नषे में है। बात करते-करते वह बड़बड़ाने लगता था। कई बार तो आधी रात को उसका फोन आ जाता और अपनी नई कविता या गज़ल सुनाने लगता। कभी-कभी तो बच्चों की तरह जोर-जोर से रोता भी। सच कहूं तो मेरे लिए वह बहुत ही रहस्यमयी हो गया था।
बहुत सोचने-विचारने के बाद मैंने निष्चय कर लिया कि सहगल की पगड़ी रस्म में अवष्य जाऊंगा। रात की ट्रेन पकड़कर मैं सुबह छह बजे कोरबा पहुंच गया। पगड़ी की रस्म कहां होनी थी इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी। स्टेशन के पास स्थित होटल में दो-ढाई घण्टे तक आराम करने के बाद मैंने अपने एक परिचित पत्रकार मित्र से मिलने की ठानी। उसका मोबाइल नंबर मेरे पास नहीं था। नाष्ता करने के बाद मैं उसके कार्यालय जा पहुंचा। बहुत देर तक हम इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर मैं मुद्दे की बात पर उतर आया। उसे तो सहगल के गुजर जाने की जानकारी भी नहीं थी। मेरे काफी अनुरोध करने पर वह सहगल के घर चलने को तैयार हुआ। घर पहुंचे तो वहां ताला लगा था।
पड़ोसी ने बताया कि करीब स्थित धर्मशाला में दोपहर एक बजे पगड़ी रस्म की जाएगी। सहगल के पड़ोसी पत्रकार मित्र से वाकिफ थे इसलिए उन्होंने चाय पीने के लिए हमें रोक लिया। मित्र ने उन्हें मेरा परिचय देते हुए बताया कि ये सहगल की पगडी रस्म में शामिल होने के लिए नागपुर से यहां आए हैं। पड़ोसी वहीं के हाईस्कूल में शिक्षक थे। उनकी बातचीत के अंदाज से मुझे यह समझने में देरी नहीं लगी कि उन्हें सहगल के इस दुनिया को अलविदा कह जाने का कोई गम नहीं था। हमारे यहां जो गुजर जाते हैं उनकी बुराई करने से बचा जाता है, लेकिन शिक्षक तो जैसे सहगल के जीवन के सभी काले पन्ने खोलने की राह देख रहे थे। वह हद दर्जे का पियक्कड़ था। तब तक पीता रहता जब तक लुढ़क नहीं जाता। उसकी इसी आदत की वजह से पत्नी तीन साल पहले अपने बड़े बेटे के पास कनाडा चली गई। पत्नी के जाने के बाद उसने वेश्याओं को अपने घर लाना शुरू कर दिया था। कोई समझाता तो उसी पर बरस पड़ता। कोई उसके घर की तरफ झांकता तो गंदी-गंदी गालियां देने लगता। चौबीस घण्टे घर के खिड़की-दरवाजे बंद रखता। नषे में चीख-चीख कर यही कहता रहता कि इस शहर के सभी लोग मेरी जान के दुश्मन हैं। मेरी हत्या करने की साजिषें रची जा रही हैं। शराब और शबाब के चक्कर में वह कहीं का न रहा। अच्छा-खासा घर था वो भी बिक गया। पिछले सात-आठ महीनों से वह धर्मशाला के एक छोटे से कमरे में रह रहा था। पहले अंग्रेजी पीता था, अब देसी चढ़ाने लगा था। धर्मशाला वाले भी उसे वहां से खदेड़ने की तैयारी में थे। उसके मरने की वास्तविक तारीख किसी को पता नहीं है। कमरे से वह चार-पांच दिन से बाहर नहीं निकला था। वैसे ऐसा अक्सर होता था। धर्मशाला में ठहरे कुछ मुसाफिरों ने प्रबंधकों को कमरे से दुर्गंध आने के बारे में बताया तो कमरे का दरवाजा तोड़ा गया। सहगल बिस्तर पर मरा पड़ा था। चारपाई के नीचे खाली देसी षराब की बोतलें बिखरी पड़ी थीं। षिक्षक महोदय और भी बहुत कुछ बताना चाहते थे, लेकिन हम वहां से निकल लिए।
दोपहर के सवा एक बजे तक हम दोनों धर्मशाला के उस हॉल में पहुंच गए जहां पर सहगल की पगड़ी रस्म आयोजित थी। मुझे यह देखकर बेहद धक्का लगा कि वहां पर पंडित जी, सहगल के बेटे के अलावा दो और लोग ही बैठे थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छह लोग! हम दोनों ने सहगल की तस्वीर पर फूल चढ़ाये और वहां बैठ गए। पंडित जी दो बजे तक इस इंतजार में बैठे रहे कि कुछ और लोग आ जाएं तो पगड़ी की रस्में पूरी की जाएं, लेकिन उपस्थितों का आंकड़ा नहीं बढ़ पाया। आखिरकार सहगल के बेटे के अनुरोध पर पंडित जी ने बड़े बुझे मन से पूजा-पाठ कर कुछ मंत्र पढ़े और दक्षिणा का लिफाफा लेकर चलते बने। विदा लेते समय सहगल के बेटे के चेहरे पर जो पीड़ा और षर्मिंदगी देखी वह कई दिनों तक व्यथित करती रही। उसकी आंखों में ठहरे आंसू मुझे भिगोते रहे। अब भी जब कभी उस मनुष्य की याद आती है तो सहगल पर बहुत गुस्सा आता है। वह तो चला गया, लेकिन बेटे को उम्र भर की सज़ा दे गया! पांच साल से ज्यादा का समय बीत गया है सहगल को इस दुनिया से विदा हुए। आज एकाएक सहगल की याद आने की वजह है शहर के सभी दैनिक अखबारों में प्रकाषित यह खबर जो हर संवेदनषील पाठक को स्तब्ध और मुझे उसकी याद दिला उदास कर गयी: ‘‘महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में मंगलवार की दोपहर में उम्रदराज भाई-बहन के शव घर में मिले। उनका पालतू श्वान भी मरा हुआ पाया गया। तीनों की चार से पांच दिन पहले मृत्यु होने का संदेह है। षवों का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का कहना है दोनों भाई-बहन के पेट में एक दाना तक नहीं था। यानी उनकी मौत भूख की वजह से हुई थी। जबकि घर में आठ ड्रमों में अनाज भरा पड़ा था। यह भी काबिलेगौर है कि भाई के खाते में 36 लाख और बहन के खाते में एक लाख तीस हजार जमा थे। बिना प्लास्टर के जर्जर से दिखने वाले घर की कीमत भी दस करोड़ से ज्यादा है। दोनों भाई-बहन बहुत ही कम घर से बाहर निकलते थे। किसी को घर के भीतर आने नहीं देते थे। पता नहीं किस वजह से दोनों भयभीत रहते थे। सड़क और  भीड़-भाड़ वाले रास्तों पर चलने से बेहद घबराते थे। अपने पड़ोसियो से कभी भी उन्हें बात करते नहीं देखा गया। मिलना-जुलना तो बहुत दूर की बात है। इंसानों से दूरी बनाकर रखने वाले ये भाई-बहन जानवरों के बहुत करीब थे। एक समय ऐसा भी था जब बस्ती में घूमने वाले ष्वानों के लिए प्रतिदिन पचास लीटर दूध खरीदकर उन्हें पिलाया करते थे। उन्होंने घर में भी बीस श्वान पाल रखे थे। कुछ समय बाद उनके पास दो ष्वान ही बचे रह गए, जिसमें से उनकी मौत के साथ एक की मौत हो गई, दूसरा अंधा और बेहरा था जो बेहोशी की हालत में मिला। उनके घर के कमरों को देखकर लगता है कि जैसे वहां पर भूत रहते रहे हों! उनकी मौत के बाद भी कोई रिश्तेदार सामने नहीं आया। तालाबंद घर में हुई भाई-बहन की रहस्यमयी मौत चर्चा का विषय बनकर रह गई है।’’

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