Wednesday, March 20, 2019

लोकतंत्र की जय...
काल मार्क्स कह गये हैं, सŸाा इंसान को भ्रष्ट बना देती है। कांग्रेस के नेता ने जयपुर के चिंतन शिविर में प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए बड़े बुझे मन से कहा था कि सŸाा तो जहर है। देश के एक केंद्रीय मंत्री अक्सर कहते देखे जाते हैं कि वे राजनीति में आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं। वे तो इतने अक्लमंद हैं कि अगर व्यापार कर रहे होते तो हर शाम 10 करोड़ रुपए लेकर अपने घर जाते और सुख की नींद सो जाते। अपने देश में कई राजनेता ऐसे हैं जो हमेशा यही दर्शाते नहीं थकते कि जनसेवा की भावना से ओतप्रोत होने के कारण उन्होंने राजनीति का दामन थामा है। उनसे जनता के कष्ट देखे नहीं जाते। वे हर किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं। जनसेवा के लिए उन्होंने हंसते-हंसते अपनी सभी इच्छाओं और सुख-सुविधाओं को भी कुर्बान कर दिया है।
दुनिया में ऐसा कौन सा इंसान है जो धन नहीं पाना चाहता? धनपति बनने की चाहत तो ताउम्र बनी रहती है, लेकिन सवाल यह है कि कितने लोग अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर धनपति बनते हैं? बड़ा ही आसान जवाब है। अधिकांश लोगों की यही मंशा होती है कि उन्हें धन पाने के लिए मेहनत ही न करना पड़े। अपराध के मार्ग पर चलने वाले लोगों को बहुत जल्दी धनपति बनते देखा जाता है। भ्रष्ट नौकरशाह और राजनीति के खिलाड़ियों के यहां भी देखते ही देखते दौलत का अंबार लग जाता है। भ्रष्टों के बारे में तरह-तरह की बातें होना आम बात है और यह भी आम बात है कि हर भ्रष्टाचारी सीना तानकर ईमानदार होने के दावे करता है। राजनेताओं की तो बात ही अलग है। वे खुद को खास समझते हैं। आम और खास लोगों के मसीहा। सभी को अपनी बातों के मक्कड़जाल में उलझाये रखते हैं।
जो सŸाा को ज़हर कहते हैं उनसे जब यह पूछा जाता है कि आप इस ज़हर से  मुंह क्यों नहीं मोड़ लेते। ज़हर को षहद की तरह सतत चूसने का मोह त्याग क्यों नहीं देते?... उनका जो जवाब होता है उसका यही अभिप्राय होता है कि हम दूसरों के लिए इस विष को पीते हैं। हम अपने देशवासियों को कष्ट में नहीं देख सकते। हमारे पूर्वजों ने देश सेवा का जो पाठ पढ़ाया है और दीन-दुखियों के कष्टों के निवारण की जो सीख दी है उससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते।
देशवासियों के मन में अगर झांका जाए तो वहां यही इबारत लिखी मिलेगी कि इस धरती पर नेताओं और सŸााधीशों से जहरीला, धूर्त, कपटी और विश्वासघाती और कोई प्राणी नहीं है। भारत के अधिकांष नेताओं और सŸााधीशों ने जनता को जख्म ही दिए हैं। इनके संपूर्ण सच से वाकिफ होने के बावजूद भी इनके नाटकों को देखने और शातिर बोल वचनों को चुपचाप सुनने के अलावा देशवासियों के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। खुद को सच्चा जनसेवी बताने वाले अधिकांष विधायक, सांसद, मंत्री तरह-तरह के कारोबार करते हैं। सिंचाई, लोकनिर्माण और सभी सरकारी ठेके इन्हीं के हिस्से में आते हैं, जिनसे यह करोड़ों-अरबों कमाते हैं। करोड़ों की सरकारी जमीनें कौड़ियों के भाव हथियाने वाले यह जनसेवक अनपढ़ होते हुए भी बड़े-बड़े इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के मालिक बन शिक्षा जगत का मजाक उड़ाते हुए रातों-रात मालामाल हो जाते हैं।
दरअसल भारत की राजनीति में तरह-तरह के व्यापारियों का वर्चस्व है, जिनके नंगे सच को भी नजरअंदाज करना पड़ता है। दलितों और शोषितों की मसीहा, जिन्हें बहनजी कहा जाता है उन्हें कौन नहीं जानता। वर्ष 2003 में उनकी कुल संपŸिा लगभग एक करोड़ रुपए के आसपास थी। 2012 में राज्यसभा का नामांकन भरते समय उन्होंने खुद अपनी संपŸिा 111 करोड़ घोषित की। ऐसी गगनचुम्बी तरक्की राजनीति के धंधे में ही संभव है। उनका कहना है कि उनके समर्थक उन्हें धन देते हैं। बहनजी से जब यह सवाल किया जाता है कि उन्हें जो चंदा और सहायता दी जाती है वह तो पार्टी के लिए होती है उनके निजी उपयोग के लिए नहीं....तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता। यह अकेले बहनजी की बात नहीं। देश में अधिकांश राजनीतिक पार्टियां ऐसे ही चल रही हैं। बिल्कुल व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह। यहां के कुछ चतुर-होशियार राजनेता शक्कर कारखाने स्थापित कर गन्ने से चीनी बनाने के बजाय एलकोहल तैयार करते हैं, जिसे बड़े-बड़े शराब व्यवसायियों को सप्लाई कर मोटी कमायी कर अपनी तिजोरी भरने के बावजूद खुद को असली राष्ट्रभक्त दर्शाते हैं। कुछ ही नेता ऐसे होंगे जिन्होंने आय से अधिक सम्पŸिा नहीं जुटा कर रखी होगी। भारतीय लोकतंत्र का असली मज़ा तो यही लोग लूट रहे हैं। दरअसल यह लोग हद दर्जे के घुटे हुए सौदागर हैं, जिन्होंने अथाह मालामाल होने के लिए राजनीति में घुसपैठ कर ली है। अच्छे लोग राजनीति से दूरी बनाये रहें इसलिये यह चतुर-होशियार चेहरे उन्हें डराते रहते हैं। देश इनके चंगुल में फंस कर रह गया है। बड़े-बुजुर्ग कहते भी रहे हैं कि जिस देश का राजा व्यापारी होता है वहां की प्रजा भूखी मरने को विवश होती है और जिस देश की सŸाा में चतुर कारोबारियों का वर्चस्व होता है वहां अमीर और अमीर तथा गरीब लगातार बरबाद होते चले जाते हैं। फिर अन्ततः एक दिन ऐसा भी आता है जब उन्हें अमीरों का गुलाम बनकर रह जाना पड़ता है।

Thursday, February 7, 2019

तालियों के हकदार

अक्सर ऐसा होता है। जब कोई हमारा दूर का रिश्तेदार, दोस्त सा परिचित गुज़र जाता है तो हम संवेदना व्यक्त करते-करते उसकी उम्र भी पूछ लेते हैं। जैसे ही हमें उसके उम्रदराज होने का पता चलता है तो हमारे दु:ख प्रकट करने का अंदाज बदल जाता है। अक्सर ऐसा भी होता है कि खबर देने वाला व्यक्ति भी बडी सहजता से यह कहता है कि उनकी  अच्छी-खासी उम्र हो चुकी थी। ऊपर वाले के लिखे को कौन बदल सकता है। यह बात भी अच्छी रही कि उन्हें अस्पताल का मुंह नहीं देखना पडा। ऐसा भी देखने में आता है कि जो लोग अपनी उम्र की नब्बे-पंचानबें वर्ष की दहलीज पार कर लेते हैं उनके स्वर्गवासी होने पर ज्यादा मातम नहीं मनाया जाता। उनके जिंदा रहते भी उनकी सोच, चाहत और भावनाओं की खास कद्र नहीं की जाती। इस मानवीय सोच को ताक पर रख दिया जाता है कि उनके भी अभी कई सपने अधूरे हो सकते हैं जिन्हें वे पूरा करना  चाहते होंगे। हमारे यहां जन्मजात दिव्यांगों को भी सहानुभूति के सिवाय कुछ नहीं मिलता। उनमें भी कुछ अलग हटकर करने का ज़ज्बा हो सकता है इसकी कल्पना ही नहीं की जाती। इसलिए उन्हें उस वातावरण और शिक्षा-दीक्षा से वंचित रखा जाता है, जो दूसरों को हंसी-खुशी दी जाती है। दुनिया में कितने ही ऐसे उम्रदराज और जन्मजात दिव्यांग हुए हैं और जिन्होंने आम इंसानी सोच पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे गलत साबित कर दिखाया है...
 उनका नाम है गुरूचरण सिंह। उम्र १०७ वर्ष। डिफेंस मिनिस्ट्री में सीनियर रिसेप्शन ऑफिसर थे। ३१ मार्च १९७१ को रिटायर हुए। कुछ दिन पूर्व उम्रदराज गुरूचरण के बाथरूम में गिरने से हीप में बायीं और फ्रेक्चर हो गया। उनके पोते उन्हें अस्पताल ले गए। डॉक्टरों को जब गुरूचरण की उम्र बतायी गयी तो वे असमंजस में पड गये। काफी देर तक वे आपस में सलाह करते रहे। अंतत: उन्होंने उनकी सर्जरी करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि अभी तक दुनिया में इस उम्र में किसी की सर्जरी नहीं हुई है। लेकिन गुरूचरण सर्जरी के लिए अड गए। उन्होंने अपने अच्छे स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा, 'मैं बेड पर लेटे रहना नहीं चाहता। जैसे मैं पूरी उम्र रहा हूं, वैसे ही अब रहना चाहता हूं। मुझे किसी पर आश्रित रहना कतई पसंद नहीं। बदनसीबी से ऐसे दिन कभी आए भी तो मर जाना पसंद करूंगा।' डॉक्टर उनकी जिद और सोच को देखकर हैरान रह गए। जब उनकी शारीरिक जांच की गई तो उन्हें पूरी तरह से फिट पाया गया। न ब्लड प्रेशर, न डायबिटिज, न ही वे कोई दवा ले रहे थे। आमतौर पर लंबी उम्र में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं लेकिन १०७ की उम्र में भी उनकी हड्डी में जरा भी कमजोरी नहीं आयी थी। उनकी जीने की ललक और फिटनेस से डॉक्टर बेहद प्रेरित हुए। पूरी टीम उत्साह और जोश के साथ सर्जरी की तैयारी में जुट गई। उनकी फिटनेस की वजह से एनेस्थीसिया दी गई और ४० मिनट में सर्जरी हो गयी। शनिवार को सर्जरी हुई। सोमवार को अपने पैरों पर खडे होकर वे अपने घर चल दिए। अस्पताल में उनकी चार पीढी के लोग साथ थे। उन्हें अच्छी तरह से चलते देख सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे। डॉक्टरों का दावा है कि इस उम्र में अनसिमेंटेंड इंप्लांट से हिप रिप्लेसमेंट की सफल सर्जरी कराने वाले गुरुचरण दुनिया के सबसे बुजुर्ग इंसान हैं। डॉक्टरों ने इस उपलब्धि को 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड  रिकॉर्ड' के लिए भी भेज दिया है।
जिस उम्र में बडे-बडे तुर्रमखां ज्यादा भागदौड करने से घबराते हैं उसी उम्र में यदि कोई हिमालय फतह करने का इतिहास रचे तो उसके आत्मबल और शौर्य को सलाम तो किया ही जाना चाहिए। केरल में स्थित त्रिशूर में निवासरत चित्रण नक्बूदिरी पाद कुछ ही महीने के बाद अपने जीवन के सौ साल पूर्ण करने जा रहे हैं। अब तक उन्नतीस दफे हिमालय की अलग-अलग चोटियों को अपने कदमों से नाप चुके हैं। चित्रण का अभी भी मन नहीं भरा है। इस उम्र में भी उनका इतना हिम्मती और साहसी होना लोगों को स्तब्ध कर देता है। वे पूरी तरह से शाकाहारी हैं। फल और सब्जियां खूब खाते हैं। नियमित योग व व्यायाम करना उनकी आदत में शुुमार हो चुका है। चित्रण कहते हैं कि मेरे लिए हर दिन मेरा जन्मदिन होता है। मैं उपलब्धियों का जश्न मनाता हूं। अगर आप खुद को उम्रदराज महसूस करेंगे तो खुद को थका हुआ पायेंगे। जीवन थकने नहीं चलने का नाम है।
कुछ लोग कमजोरी को अपनी ताकत बनाकर दुनिया पर राज करते हैं तो कुछ अपनी कमजोरी और कमी के बोझ तले दबकर अपना नामों-निशां ही मिटाकर रख देते हैं। किसी ने गलत नहीं कहा है कि जिसने खुद पर यकीन कर लिया उसने समझो सारा संसार ही जीत लिया। १९८२ में मेलबर्न आस्ट्रेलिया में जन्मे निकोलस जेम्स आज की तारीख में एक विश्वप्रसिद्ध मोटिवेशन स्पीकर हैं। करोडों की कमायी करने वाले निकोलस के हाथ-पैर नहीं हैं। टेट्रा समोलिया सिड्रोंम बीमारी की वजह से मां के गर्भ से ही निकोलस के हाथ-पैर का विकास नहीं हो पाया था। बिना हाथ-पैर वाले इंसान की कल्पना भी कंपा कर रख देती है। तय है कि निकोलस के लिए जीवन का सफर कतई आसान नहीं था। स्कूल में सहपाठी निकोलस की अपंगता का मजाक उडाते तो उनके पास आहत होने के सिवा और कोई चारा नहीं होता था। माता-पिता और भाई बहन ने अगर हौसला नहीं बढाया होता तो उन्होंने दस साल की उम्र में ही आत्महत्या कर ली होती। उन्हीं की प्रेरणा से परमात्मा पर विश्वास करते हुए नई सोच और नई दिशा की राह पकड ली। मनोबल बढाने वाले साहित्य के असंख्य पन्नों को पढने और आत्मसात करने के बाद उन्हें यह सच भी समझ में आ गया कि लोगों की बातों की परवाह करना बेवकूफी है। जीवन में जो कुछ होता है, किसी मकसद से होता है। भय ही मनुष्य की सबसे बडी विकलांगता है। अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाने वाले निकोलस ने सत्रह वर्ष की उम्र में खुद का ही एक एनजीओ, 'लाइफ विदाउट लिंब्स' शुरू किया। आज दुनिया के बेहतरीन मोटिवेशनल स्पीकर्स में से एक माने जाने वाले यह अद्भुत योद्धा चालीस से अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। निकोलस एक प्रभावी वक्ता, लेखक, संगीतकार और पेंटर भी हैं। उन्हें बेखौफ होकर तैराकी करते देख लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। हमेशा उमंग और जोश में रहने वाले निकोलस जब अपने भाषणों में यह कहते हैं 'उम्मीद को खोना हाथ-पैर खोने से ज्यादा बुरा है, तो तालियों की गडगडाहट से हजारों श्रोताओं से भरा सभागृह गूंज उठता है। जो शख्स अपनी पत्नी का हाथ पकडने में पूरी तरह से अक्षम हो उससे कौन युवती शादी करेगी? इसी सवाल और विचार को अपने मन-मस्तिष्क में बसाये निकोलस पर एक खूबसूरत युवती का ऐसा दिल आया कि वह उसके साथ शादी के लिए अड गई। आज वे न सिर्फ शादीशुदा है, बल्कि दो बच्चों के पिता भी हैं।

Friday, January 25, 2019

खता की सज़ा?


उस दिन रात के लगभग दस बज चुके थे। मैं सोने की तैयारी कर रहा था। तभी मोबाइल स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमका। मैंने फोन उठा लिया। उधर से आवाज आई, ‘‘अंकल मैं कोरबा से आपके पुराने मित्र अनिल सहगल का बेटा बोल रहा हूं। पापा नहीं रहे। परसों शुक्रवार को पगड़ी रस्म है।’’ मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही फोन बंद हो गया। मैं जानना चाहता था कि सहगल अचानक कैसे चल बसा। सहगल मेरा कॉलेज के जमाने का दोस्त था। हालांकि कॉलेज छोड़ने के बाद हमारा कभी मिलना नहीं हो पाया। उसके पिता लोहे के बहुत बड़े कारोबारी थे, लेकिन सहगल साहित्य प्रेमी था। अक्सर कहा करता था कि वह कभी भी व्यापार के क्षेत्र में नहीं जाएगा। बी-कॉम की पढ़ाई के दौरान ही उसकी लिखी कविताएं और गज़लें यहां-वहां की पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। वह प्रकाशित कविताओं की कटिंग को ऐसे संभाल कर रखता था जैसे वे कोई अनमोल खजाना हों। बी.कॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद हम अपने-अपने शहर चले गये। मैं बिलासपुर में एक दैनिक समाचार में नौकरी करने लगा। उसने कोरबा में बर्तन की दुकान खोल ली थी। वैसे यह सच्चाई हैरान करने वाली थी। कुछ वर्षों के पश्चात मैं रायपुर जाकर रहने लगा। वहां पर भी लगभग बारह वर्ष तक विभिन्न अखबारों की नौकरी बजायी। उसके पष्चात अपने अखबार के प्रकाषन के इरादे के साथ नागपुर जा पहुंचा। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये। बच्चों के भी बच्चे हो गये। अपने काम के अलावा किसी को याद करने का समय ही नहीं मिला।
सातेक वर्ष पूर्व किसी पत्रिका के पन्ने पलटते-पलटते उसमें छपी कविता, कवि के नाम और उसकी तस्वीर पर नज़र थमी की थमी रह गई। जिस अनिल सहगल को मैं भूल चुका था वह एकाएक जैसे मेरे सामने आ खड़ा हुआ। कविता के साथ छपी फोटो बता रही थी कि उसे कवि की जवानी के दिनों में खींचा गया है। उसके बाद तो मैं विभिन्न पत्रिकाओं और दैनिकों के रविवार अंक में छपने वाली कविताओं और गज़लों पर नजरें गड़ाये रहता। कभी-कभार उसकी लिखी कविता और गज़ल का दीदार हो जाता। इसी दौरान एक पत्रिका में उसका मोबाइल नंबर कविता के साथ नजर आया तो मेरी उससे बातचीत भी होने लगी। उसी ने बताया कि बर्तन की दुकान कब की बंद हो चुकी है। दोनों बेटे विदेष में नौकरी कर रहे हैं। माता-पिता भी स्वर्ग सिधार गये हैं। पिता की जमीन-जायदाद और खेती बाड़ी पर उसके तीनों भाइयों ने कब्जा जमा लिया है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में समय-समय पर होने वाले कवि सम्मेलनों में उसे सम्मान के साथ बुलाया जाता है और अन्य कवियों की तुलना में उसे मोटे लिफाफे मिल जाते हैं। शहर की मुख्य सड़क पर खुद का घर है, जिसकी कीमत आज करोड़ों में है। घर के ऊपर के चार कमरे किराये पर दे रखे हैं, जिससे हर माह दस हजार रुपये मिल जाते हैं। हम दोनों की बड़े मज़े से कट रही है। मोबाइल पर होने वाली बातचीत में अक्सर मुझे यही आास होता कि वह नषे में है। बात करते-करते वह बड़बड़ाने लगता था। कई बार तो आधी रात को उसका फोन आ जाता और अपनी नई कविता या गज़ल सुनाने लगता। कभी-कभी तो बच्चों की तरह जोर-जोर से रोता भी। सच कहूं तो मेरे लिए वह बहुत ही रहस्यमयी हो गया था।
बहुत सोचने-विचारने के बाद मैंने निष्चय कर लिया कि सहगल की पगड़ी रस्म में अवष्य जाऊंगा। रात की ट्रेन पकड़कर मैं सुबह छह बजे कोरबा पहुंच गया। पगड़ी की रस्म कहां होनी थी इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी। स्टेशन के पास स्थित होटल में दो-ढाई घण्टे तक आराम करने के बाद मैंने अपने एक परिचित पत्रकार मित्र से मिलने की ठानी। उसका मोबाइल नंबर मेरे पास नहीं था। नाष्ता करने के बाद मैं उसके कार्यालय जा पहुंचा। बहुत देर तक हम इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर मैं मुद्दे की बात पर उतर आया। उसे तो सहगल के गुजर जाने की जानकारी भी नहीं थी। मेरे काफी अनुरोध करने पर वह सहगल के घर चलने को तैयार हुआ। घर पहुंचे तो वहां ताला लगा था।
पड़ोसी ने बताया कि करीब स्थित धर्मशाला में दोपहर एक बजे पगड़ी रस्म की जाएगी। सहगल के पड़ोसी पत्रकार मित्र से वाकिफ थे इसलिए उन्होंने चाय पीने के लिए हमें रोक लिया। मित्र ने उन्हें मेरा परिचय देते हुए बताया कि ये सहगल की पगडी रस्म में शामिल होने के लिए नागपुर से यहां आए हैं। पड़ोसी वहीं के हाईस्कूल में शिक्षक थे। उनकी बातचीत के अंदाज से मुझे यह समझने में देरी नहीं लगी कि उन्हें सहगल के इस दुनिया को अलविदा कह जाने का कोई गम नहीं था। हमारे यहां जो गुजर जाते हैं उनकी बुराई करने से बचा जाता है, लेकिन शिक्षक तो जैसे सहगल के जीवन के सभी काले पन्ने खोलने की राह देख रहे थे। वह हद दर्जे का पियक्कड़ था। तब तक पीता रहता जब तक लुढ़क नहीं जाता। उसकी इसी आदत की वजह से पत्नी तीन साल पहले अपने बड़े बेटे के पास कनाडा चली गई। पत्नी के जाने के बाद उसने वेश्याओं को अपने घर लाना शुरू कर दिया था। कोई समझाता तो उसी पर बरस पड़ता। कोई उसके घर की तरफ झांकता तो गंदी-गंदी गालियां देने लगता। चौबीस घण्टे घर के खिड़की-दरवाजे बंद रखता। नषे में चीख-चीख कर यही कहता रहता कि इस शहर के सभी लोग मेरी जान के दुश्मन हैं। मेरी हत्या करने की साजिषें रची जा रही हैं। शराब और शबाब के चक्कर में वह कहीं का न रहा। अच्छा-खासा घर था वो भी बिक गया। पिछले सात-आठ महीनों से वह धर्मशाला के एक छोटे से कमरे में रह रहा था। पहले अंग्रेजी पीता था, अब देसी चढ़ाने लगा था। धर्मशाला वाले भी उसे वहां से खदेड़ने की तैयारी में थे। उसके मरने की वास्तविक तारीख किसी को पता नहीं है। कमरे से वह चार-पांच दिन से बाहर नहीं निकला था। वैसे ऐसा अक्सर होता था। धर्मशाला में ठहरे कुछ मुसाफिरों ने प्रबंधकों को कमरे से दुर्गंध आने के बारे में बताया तो कमरे का दरवाजा तोड़ा गया। सहगल बिस्तर पर मरा पड़ा था। चारपाई के नीचे खाली देसी षराब की बोतलें बिखरी पड़ी थीं। षिक्षक महोदय और भी बहुत कुछ बताना चाहते थे, लेकिन हम वहां से निकल लिए।
दोपहर के सवा एक बजे तक हम दोनों धर्मशाला के उस हॉल में पहुंच गए जहां पर सहगल की पगड़ी रस्म आयोजित थी। मुझे यह देखकर बेहद धक्का लगा कि वहां पर पंडित जी, सहगल के बेटे के अलावा दो और लोग ही बैठे थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छह लोग! हम दोनों ने सहगल की तस्वीर पर फूल चढ़ाये और वहां बैठ गए। पंडित जी दो बजे तक इस इंतजार में बैठे रहे कि कुछ और लोग आ जाएं तो पगड़ी की रस्में पूरी की जाएं, लेकिन उपस्थितों का आंकड़ा नहीं बढ़ पाया। आखिरकार सहगल के बेटे के अनुरोध पर पंडित जी ने बड़े बुझे मन से पूजा-पाठ कर कुछ मंत्र पढ़े और दक्षिणा का लिफाफा लेकर चलते बने। विदा लेते समय सहगल के बेटे के चेहरे पर जो पीड़ा और षर्मिंदगी देखी वह कई दिनों तक व्यथित करती रही। उसकी आंखों में ठहरे आंसू मुझे भिगोते रहे। अब भी जब कभी उस मनुष्य की याद आती है तो सहगल पर बहुत गुस्सा आता है। वह तो चला गया, लेकिन बेटे को उम्र भर की सज़ा दे गया! पांच साल से ज्यादा का समय बीत गया है सहगल को इस दुनिया से विदा हुए। आज एकाएक सहगल की याद आने की वजह है शहर के सभी दैनिक अखबारों में प्रकाषित यह खबर जो हर संवेदनषील पाठक को स्तब्ध और मुझे उसकी याद दिला उदास कर गयी: ‘‘महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में मंगलवार की दोपहर में उम्रदराज भाई-बहन के शव घर में मिले। उनका पालतू श्वान भी मरा हुआ पाया गया। तीनों की चार से पांच दिन पहले मृत्यु होने का संदेह है। षवों का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का कहना है दोनों भाई-बहन के पेट में एक दाना तक नहीं था। यानी उनकी मौत भूख की वजह से हुई थी। जबकि घर में आठ ड्रमों में अनाज भरा पड़ा था। यह भी काबिलेगौर है कि भाई के खाते में 36 लाख और बहन के खाते में एक लाख तीस हजार जमा थे। बिना प्लास्टर के जर्जर से दिखने वाले घर की कीमत भी दस करोड़ से ज्यादा है। दोनों भाई-बहन बहुत ही कम घर से बाहर निकलते थे। किसी को घर के भीतर आने नहीं देते थे। पता नहीं किस वजह से दोनों भयभीत रहते थे। सड़क और  भीड़-भाड़ वाले रास्तों पर चलने से बेहद घबराते थे। अपने पड़ोसियो से कभी भी उन्हें बात करते नहीं देखा गया। मिलना-जुलना तो बहुत दूर की बात है। इंसानों से दूरी बनाकर रखने वाले ये भाई-बहन जानवरों के बहुत करीब थे। एक समय ऐसा भी था जब बस्ती में घूमने वाले ष्वानों के लिए प्रतिदिन पचास लीटर दूध खरीदकर उन्हें पिलाया करते थे। उन्होंने घर में भी बीस श्वान पाल रखे थे। कुछ समय बाद उनके पास दो ष्वान ही बचे रह गए, जिसमें से उनकी मौत के साथ एक की मौत हो गई, दूसरा अंधा और बेहरा था जो बेहोशी की हालत में मिला। उनके घर के कमरों को देखकर लगता है कि जैसे वहां पर भूत रहते रहे हों! उनकी मौत के बाद भी कोई रिश्तेदार सामने नहीं आया। तालाबंद घर में हुई भाई-बहन की रहस्यमयी मौत चर्चा का विषय बनकर रह गई है।’’